झांसी । वैसे तो हिंदी राष्ट्रभाषा होकर भी अपने ही घर में बेगानी रही पर बुंदेलखंड में हिंदी के ऐसे भी सपूत जन्में जिन्होंने हिंदी को विदेशी भाषाओं के ऊपर लाकर खड़ा कर दिया। उन्हीं में से एक नाम है उपन्यास सम्राट वृंदावन लाल वर्मा। इनकी तुलना अंग्रेजी उपन्यासकार वाल्टर स्काट से की जाती है। इन्हें हिंदी उपन्यास जगत का वाल्टर स्काट कहा जाता है। इनके उपन्यासों में खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है, पर विषयवस्तु और पात्र बुंदेलखंड के आसपास के ही हैं। उपन्यासों का जिस तरह से तानाबाना बुना गया है उसने हिंदी को तो नई ऊंचाई दी ही है। वाल्टर स्काट अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार थे। ठीक इसी परंपरा को डा. वृंदावन लाल वर्मा ने गढ़कुंडार, विराटा की पद्मिनी और मृगनयनी जैसे उपन्यासों की रचना करके हिंदी के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपन्यासों को उत्कर्ष तक पहुंचाया।
वृंदावन लाल वर्मा के उपन्यासों में है समाजवाद का दर्शन
इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि डा. वृंदावन लाल वर्मा ने प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हिंदी उपन्यास के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने मृगनयनी, गढ़कुंडार और विराटा की पद्मिनी जैसे उपन्यासों की रचना कर इतिहास के समकालीन चित्र खींचे तो वहीं समाजवाद के भी दर्शन कराए। मृगनयनी एक गूजर की बेटी पर महाराजा मान सिंह सिर्फ इस बात पर रीझ जाते हैं कि वह एक अच्छी शिकारी और निशानेबाज थीं। उन्होंने समाज के सारे बंधनों और गरीबी अमीरी के अंतर को मिटाकर उसे अपनी महारानी बना लिया। टूटे कांटे. अमरबेल जैसे उपन्यासों के माध्यम से वर्मा जी ने सहकारिता के क्षेत्र में हिंदी उपन्यास में एक नया प्रयोग किया।
वर्मा जी ने नहीं किया राजाओं का महिमा मंडन
डा. वृंदावन लाल वर्मा के पौत्र लक्ष्मीकांत वर्मा बताते हैं कि अंग्रेजी में ऐतिहासिक उपन्यासों के विकास का श्रेय वाल्टर स्काट को जाता है तो हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने में डा. वृंदावन लाल वर्मा का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिए तो इन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी ने हिंदी के वाल्टर स्काट की उपाधि दी थी। लक्ष्मीकांत वर्मा बताते है कि हालांकि , डा. वृंदावन लाल वर्मा और वाल्टर स्काट में थोड़ा सा अंतर है उन्होंने जहां अपने ऐतिहसिक उपन्यासों में सामंतों और राजाओं का महिमा मंडन किया है वहीं वृंदावन लाल वर्मा में राजाओं का महिमा मंडन न कर इतिहास में सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता दी।