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देश स्वतंत्र होने के बाद भी नहीं बन सके सिमरधा गांव के सेनानियों के स्मारक

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झांसी। जिले का सिमरधा गांव, जहां 1945 में अंग्रेजों के फरमान को यहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने मानने से साफ इंकार कर दिया था। अंग्रेजों ने तहसीलदार के साथ सिपाहियों को भेजकर गांव के एक मैदान में लाइन में खड़ा करके इन सेनानियों के बदन पर घंटों लाठियां और कोड़े बरसाएं थे। इसमें बीस से अधिक सेनानी गंभीर रूप से घायल हुए थे। इन सेनानियों को जिस स्थान पर यातनाएं दी गईं थी, वह स्थान आज भी मौजूद है। आजादी के बाद सरकार ने इनके योगदान को तो स्वीकार किया, पर इनकी याद में उस मैदान में स्मारक नहीं बनाया है। इस संबंध में गांव के लोग कई बार ज्ञापन सौंपकर मांग भी कर चुके हैं पर शासन ने इस ओर आज तक ध्यान नहीं दिया। इस घटना का साक्षी एक मात्र पुराना मकान मौजूद है, जिसके सामने के मैदान में अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को यातनाएं देकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करके जुर्माना लगाया था।
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द्वितीय विश्व के समय अंग्रेजों ने हर घर से मांगा था एक पाई और एक भाई
सिमरधा गांव निवासी सुबराती खान बताते हैं कि बात उन दिनों की है जब देश आजाद नहीं हुआ था, सिमरधा गांव के लोग महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी कर रहे थे। इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध के चलते ब्रिटिश हुकूमत ने फरमान जारी किया कि हर गांव में हर घर से एक पाई (एक पैसे से छोटी मुद्रा) और एक भाई अंग्रेजी सेना के लिए लिया जाएगा। हर घर से एक पाई का चंदा और एक भाई को सेना में सिपाही के रूप में भर्ती किया जाएगा। सिमरधा के लोगों ने सरकार के इस फरमान को मानने से इंकार कर दिया और कह दिया था कि न पाई देंगे न भाई देंगे।
आजादी की लड़ाई की ऐतिहासिक घटना के साक्षी स्थल पर बनना चाहिए स्मारक
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार से ताल्लुक रखने वाले जय प्रकाश त्रिपाठी बताते हैं कि जब सिमरधा गांव के लोगों ने अंग्रेज सरकार का फरमान न मानते हुए नारा बुंलंद कर दिया था कि न पाई देगें और न भाई तो अंग्रेज अफसर आग बबूला हो गए तथा उन्होंने पुलिस के साथ तहसीलदार को भेजा और कहा कि किसी भी कीमत पर आदेश का पालन करवाया जाए। तहसीलदार ने गांव के एक मकान के सामने के मैदान में सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बुलाया और लाइन से खड़ा करके अंतिम चेतावनी दी कि या तो फिरंगी सरकार का आदेश माने अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहो, पर सेनानी लगातार सरकार के विरोध में नारेबाजी करते रहे और अंग्रेज सिपाहियों ने निहत्थे सेनानियों पर लठियां और हंटर बरसाना शुरू कर दिए। देखते ही देखते पूरे गांव के लोग इस मैदान में जमा हो गए, सभी भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे तथा कह रहे थे न पाई देंगे न भाई देंगे, इससे अंग्रेज अफसर आग बबूल हो गए। उन्होंने इस कदर यातनाएं दीं कि बीस से अधिक सेनानी गंभीर रूप से घायल होकर मरणासन्न हो गए थे। देश आजाद हो गया, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी अब इस दुनिया में नहीं रहे, पर स्वाधीनता आंदोलन की यह दास्तां लोगों के दिलों में है पर लोगों को इस बात का मलाल है कि सरकार इस सेनानी गांव में हुई इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी स्थल पर आज तक स्मारक नहीं बना सकी। गांव के लोगों ने मांग की है कि इस स्थान पर स्मारक बनाकर एक पट्टिका लगाकर उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम लिखे जाएं जो अंग्रेजों की यातना झेलकर मरणासन्न हो गए।
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