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पिता से छुपकर प्रैक्टिस की, किसी की मां ने किट के लिए जोड़े पैसे ...बड़े संघर्षों से बेटियों ने पाया है मुकाम

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झांसी। मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में चल रही 11वीं राष्ट्रीय सीनियर महिला हॉकी चैंपियनशिप 2021 में टेलर, दूधिया और किसानों की भी बेटियां हैं। किसी ने पिता से छुपकर प्रैक्टिस की तो किसी की मां ने किट के लिए पैसे जोड़े। बड़े संघर्षों से जूझते हुए आज यह बेटियां सीनियर हॉकी टीम में जगह बनाने में कामयाब हुई हैं। इंडिया टीम में जगह बनाने का सपना संजोए ज्यादातर खिलाड़ियों को तो भरपूर डाइट ही नहीं मिली। आर्थिक तंगी के चलते कई खिलाड़ी तो आज भी पूरी डाइट नहीं ले पा रही हैं।
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खेलों की तरफ अब बेटियों का भी रुझान तेजी से बढ़ा है। कई बेटियां ओलंपिक में भी भारत को पदक दिलाकर नाम रोशन कर चुकी हैं। इन्होंने देश की दूसरी बेटियों के लिए प्रेरणाश्रोत का काम किया है। हालांकि, सफलता के उस एक दिन के पीछे सालों का संघर्ष छुपा है। अमर उजाला ने झांसी में राष्ट्रीय सीनियर महिला हॉकी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने आईं खिलाड़ियों से बात की, तो उन्होंने अपने संघर्ष के बारे में बताया। यह भी सामने आया कि इनके खेल कॅरियर के लिए सबसे बड़ा रोड़ा अपने ही बने। आर्थिक तंगी के बावजूद महिला खिलाड़ियों ने अपने मजबूत हौसले के बदौलत प्रैक्टिस जारी रखी। घरवालों के विरोध के बावजूद उनके कदम नहीं डगमगाए। मगर आज वह जिस मुकाम तक पहुंच गई हैं, उससे परिजन गर्व महसूस करते हैं।
केस-1
मां ने गाय, बकरी का दूध बेचकर की परवरिश
नाम : समरीन, निवासी : हरिद्वार, टीम : उत्तराखंड
समरीन ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2012 से हॉकी खेलनी शुरू कर दी थी। जब छोटी थीं, तभी पिता का साया उठ गया। आठ भाई-बहनों में वो दूसरे नंबर की हैं। मां ने बकरी-गाय का दूध बेचकर सभी बच्चों को पढ़ाया। उनके जिले में हॉकी की पूर्व ओलंपियन खिलाड़ी आती थीं। उनका नाम, सम्मान देखकर समरीन के मन में भी हॉकी के प्रति लगाव हो गया। इसके बाद प्रैक्टिस शुरू कर दी। फुल बैक पोजीशन पर खेलने वाली समरीन के मुताबिक कभी अच्छी डाइट नहीं मिला। रिश्तेदार मां से कहते थे कि पढ़ाओ, खिलाओ नहीं। पढ़ाई ही काम आएगी। नौकरी लग जाएगी तो भला हो जाएगा। मगर मां को मुझ पर भरोसा था। अब इंडिया टीम में खेलने का सपना है।
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केस-2
शुरूआत में पता ही नहीं था डाइट भी कोई चीज होती है
नाम : प्रीति नोटियान, निवासी : हरिद्वार, टीम: उत्तराखंड
प्रीति के पिता पिता राकेश कुमार खेती करते हैं और मां मीला देवी ग्रहणी हैं। तीन बहनें हैं। उनके स्कूल के सामने स्टेडियम है। वहां पर खिलाड़ियों को प्रैक्टिस करते देखती थीं। 2012 में उन्होंने हॉकी खेलनी शुरू की। शुरूआत में परिजन मना करते थे कि खेल में क्या रखा है। रिश्तेदार भी विरोध में उतर आए। ग्रामीण परिवेश से आने के बावजूद उन्होंने खेल में कॅरियर बनाने की ठान ली। शुरू में पता ही नहीं था डाइट भी कुछ होती है। बीपीएड किया तब जानकारी हुई। पढ़ाई में भी खूब मेहनत की तो ग्रेजुएशन 83 फीसदी अंकों से पास हो गई। बताया कि मां का बहुत सपोर्ट मिला। मां किट और ट्रायल के लिए पैसे जोड़ती हैं। अब इंडिया टीम में खेलने का सपना है।
केस-3
पिता ने किट पहनने से ही रोक दिया था, मां ने किया सपोर्ट
नाम: वीना पांडेय, निवासी: जयपुर, टीम: राजस्थान
वीना के मुताबिक उनके पिता राजस्थान यूनिवर्सिटी में कुक थे। वह भी पिता के साथ कभी-कभार यूनिवर्सिटी चली जाती थीं। वहां महिला खिलाड़ियों को हॉकी खेलते देखती थीं। उन्होंने पिता से कहा कि वह हॉकी खेलना चाहती है। इस पर उन्होंने साफ इंकार कर दिया। पिता का कड़ा विरोध देखकर वह चुप हो गईं। मगर कुछ दिनों बाद उन्होंने पिता के ड्यूटी समय में प्रैक्टिस करनी शुरू कर दी। एक दिन पिता को पता चल गया तो उन्होंने किट पहनने से ही रोक दिया। फिर भी वह खेलती रहीं। मैचों में अच्छा प्रदर्शन किया तो अखबारों में नाम आने लगा। बाद में पिता मान गए। वीना के मुताबिक मां ने बहुत प्रोत्साहित किया। घर का खाना खाकर खेलते थे। अभी भी बहुत अच्छी डाइट नहीं मिलती है।
केस-4
पापा ने ही थमाई स्टिक, कहा-जा बेटा नाम रोशन कर
नाम: अमनदीप कौर, निवासी : कुरुक्षेत्र, टीम: हरियाणा टीम
इसी साल इंडिया कैंप कर चुकीं अमनदीप ने तो परिजनों के कहने पर ही हॉकी खेलना शुरू किया। उन्होंने बताया कि पापा ने ही हॉकी स्टिक लाकर हाथ में थमा दी थी और कहा था कि जा बेटा देश और परिवार का नाम रोशन कर। उन्होंने बताया कि पिता हरभजन सिंह टेलर और मां मनजीत कौर ग्रहणी हैं। आर्थिक समस्याओं से जूझने के बावजूद उन्होंने प्रैक्टिस जारी रखी। इस समय वह जूनियर नेशनल टीम में हैं। उन्होंने बताया कि खेल के साथ उन्होंने पढ़ाई में भी खूब मेहनत की। 12वीं की परीक्षा 92 फीसदी अंकों से पास कर स्कूल में टॉप किया है। उन्हें देखकर उनका छोटा भाई मनप्रीत सिंह भी हॉकी खिलाड़ी बन गया। वह उसे भी खेल से जुड़ी जरूरी टिप्स देती रहती हैं।
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