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रोमानिया बॉर्डर पर मेरे सामने चलीं गोलियां, माइनस पांच डिग्री में बॉर्डर पर गुजारे दो दिन

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झांसी। 26 फरवरी को विनिस्टा शहर से रोमानिया बॉर्डर के लिए निकली थी। पांच घंटे बाद बॉर्डर तक पहुंच गई। यूक्रेन से बाहर निकलने के लिए भीड़ बॉर्डर पर टूट पड़ी। इस पर वहां मौजूद सुरक्षा कर्मचारियों ने मेरे सामने हवाई फायरिंग की। यही नहीं, जिस चर्नीहीव शहर होते हुए बॉर्डर पहुंची। वहां की बिल्डिंगें अब खंडहर बन रही हैं। माइनस पांच डिग्री सेल्सियस में दो दिन बॉर्डर पर गुजारे। ये बात यूक्रेन से झांसी लौटी श्रेया गुप्ता ने बताई।
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विनिस्टा नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही श्रेया ने बताया कि उसकी 25 फरवरी को कीव से फ्लाइट थी मगर युद्ध के चलते सभी उड़ानें निरस्त कर दी गईं। परिजन लगातार भारत लौटने का दबाव बना रहे थे। दोस्तों की मदद से बस बुक हुई। सभी छात्रों ने चार-चार हजार रुपये दिए। जिस शहर में वो पढ़ती थी, वहां पर रूस का हमला नहीं हुआ था। मगर दूसरे शहरों में होने वाले धमाकों से कमरे की खिड़कियां हिल जा रही थीं। 16 फरवरी को ही रूस के द्वारा हमला करने की आशंका थी, इसलिए एक हफ्ते का खाने-पीने का सामान रख लिया था। जब युद्ध शुरू हो गया तो बनारस में रहने वाले उसकी दोस्त श्रुति घबरा गई। इसलिए उसके साथ ही रहने लगी। उसकी बिल्डिंग के नीचे बेसमेंट बना हुआ था। जब सायरन बजता था तो सभी बेसमेंट में चले जाते थे। बताया कि 26 फरवरी को सभी रोमानिया बॉर्डर पहुंच गए थे। बस ने छह किलोमीटर पहले उतार दिया था, इसलिए पैदल चलना पड़ा। बॉर्डर के पास कैफे खुला था, वहां पर ही कई छात्र-छात्राएं जमीन पर लेटे हुए थे। मानसिक तनाव इतना था कि लोग सामने रखा खाना तक खाना भूल गए थे। कइयों को श्रेया ने समझाकर खाना खाने के लिए कहा। इस बीच बर्फबारी होने लगी। माइनस पांच डिग्री सेल्सियस में दो दिन बॉर्डर पर गुजारे। चूंकि, काफी संख्या में यूक्रेन के लोग भी रोमानिया जा रहे थे। इसलिए बॉर्डर पर भगदड़ के हालात बन गए। फिर वहां मौजूद सुरक्षा कर्मचारियों को फायरिंग करनी पड़ी। दो दिन बाद उसे रोमानिया में एंट्री मिल गई। फिर 48 घंटे वहीं ठहरने के बाद दिल्ली के लिए फ्लाइट मिली। झांसी लौटी तो देखा कि चर्नीहीव में धमाके होने लगे हैं। ये वही शहर है, जहां से गुजरते हुए बॉर्डर पहुंची थी।
भाषा समझ नहीं आती थी तो शिक्षिका ने बनाया ग्रुप
श्रेया ने बताया कि यूक्रेन के न्यूज चैनल में वहां की भाषा में समाचार आते थे, जो किसी भी भारतीय छात्र को समझ नहीं आते थे। इसलिए उनकी एक शिक्षिका ने सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाया, जो युद्ध से जुड़ी हर बड़ी अपडेट उस ग्रुप में डालती थीं। फिर उस मेसेज को गूगल ट्रांसलेट करके सभी भारतीय छात्र पढ़ते थे। यही नहीं, शिक्षिका ने ही अलग-अलग सायरन के बारे में भी उन्होंने बताया। ये जानकारी दी कि किस सायरन पर गंभीर खतरा, किस पर कर्फ्यू और किस पर सुरक्षित महसूस करना है।
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खेल ने मुझे विषम हालात में भी लड़ना सिखाया
श्रेया बोली कि उसने मल्लखंभ सीखा है। मल्लखंड की प्रैक्टिस के दौरान भी चोटें आती थीं। इसलिए खेल ने मुझे विषम परिस्थितियों में भी लड़ना सिखाया है। यूक्रेन में युद्ध के हालात में मैं डरी नहीं। मां ने भी साहस दिया कि तुम तो सेना में डॉक्टर बनना चाहती हो। फिर इस युद्ध से क्या डरना।
हाथ पर लिख लिए थे जरूरी फोन नंबर
श्रेया को मां ने बताया कि उन्होंने बेटी को समझाया कि भीड़ में कहीं मोबाइल खो जाए या काम न करे तो फिर हाथ पर एंबेसी के अधिकारियों, परिजनों के नंबर लिख लो। इस पर बेटी ने तीन-चार जरूर फोन नंबरों को हाथ पर लिख लिया था।
इलाज के दौरान दम तोड़ने वाला छात्र मेरी यूनिवर्सिटी का था
श्रेया ने बताया कि ब्रेन हेमरेज के चलते जिस छात्र की इलाज के दौरान अस्पताल में मौत हुई, वो उसी के यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। उससे एक साल सीनियर था। मगर उसके कई दोस्त छात्र से परिचित थे। जैसे ही दोस्तों ने उसकी मरने की खबर सुनी वो फूट-फूटकर रोने लगे। उन्होंने बताया कि युद्ध की वजह से उसका इलाज प्रभावित हुआ है।
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