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बेमिसाल, कोरोना काल में भी हिंदी का झंडा देश-विदेश में बुलंद कर रहे झांसी वाले

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amar ujala hindi hai hum
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झांसी। कोरोना काल में विश्व में आवाजाही भले रुक गई हो, उद्योग-व्यापार बेशक प्रभावित हो रहे हों, झांसी के हिंदी प्रेमी विश्व स्तर पर मातृभाषा का झंडा बुलंद करने के लिए दिन-रात जुटे हैं। संस्था ‘हिंदी साहित्य भारती’ स्थापित की गई है। इसके लिए जिला इकाई से लेकर अन्य देशों में संयोजक नियुक्त कर रहे हैं। अमर उजाला की ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के साथ विश्वविद्यालय के शिक्षकों से लेकर स्कूलों के शिक्षक-शिक्षिकाएं, छात्र-छात्राएं सभी कंधे से कंधा मिलाकर आगे आ रहे हैं। वे पक्षधर हैं हिंदी को उसका सम्मान दिलाने के।
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झांसी में डाली है हिंदी के सम्मान की नींव, विश्व भर में खड़ी होंगी इमारत: डॉ.रवींद्र शुक्ल
हिंदी प्रेमी, साहित्यकार और पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ.रवींद्र शुक्ल ने कहा हिंदी के लिए कुछ करने की ठानी है ताना बाना भी बुन लिया गया है। देश-विदेश में हिंदी सेवकों का तंत्र खड़ा करने के लिए संस्था ‘हिंदी साहित्य भारती’ की स्थापना की है। 16 देशों में इसके संयोजक बना दिए गए हैं। भारत में भी 17 प्रदेशों में राज्य समिति गठित हो चुकी हैं। हिमाचल, गोवा, उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में तो कई जिला स्तर की कमेटी के संयोजक बना लिए गए हैं। विश्व भर में हिंदी के लिए काम करने वाली इस संस्था का पंजीकरण झांसी में हुआ है। इसकी नींव डालकर मुझे बहुत संतुष्टि मिल रही है। अब कोरोना काल खत्म होते ही तेजी से इसके विस्तार और उद्देश्यों की पूर्ति में जुटना है। समिति में 11 सदस्य हैं। मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.करुणाशंकर उपाध्याय समेत कई कुलपति, समर्पित साहित्यकार जुड़े हैं। कोरोना काल के बाद हिंदी को उसका सही दर्जा दिलवाने के लिए विश्व भर से हिंदी के 15 हजार विद्वानों के पत्र 2500 साहित्यकारों का प्रतिनिधिमंडल ले जाकर राष्ट्रपति को सौंपेगा। यह भी मांग की जाएगी कि संविधान से इंडिया शब्द को हटाया जाए। तकनीकी अंग्रेजी शब्दों के हिंदी अनुवाद में एकरूपता हो इसके लिए विशेष अनुरोध किया जाएगा। सभी से अपील है कि हिंदी के सम्मान के लिए आगे आएं जिस भी रूप में सहयोग कर सकते हैं करें। उन्होंने कहा, झांसी में डाली है हिंदी के सम्मान की नींव, उम्मीद है विश्व भर में खड़ी होंगी इमारत।
हिंदी में हों सभी काम, गांव से महानगरों तक बनी रहेगी गति: असमा खान
सूरज प्रसाद राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की प्रवक्ता असमा खान के अनुसार संचार का माध्यम ऐसा होना चाहिए कि कहने वाला अपनी बात कह सके और सुनने वाला कहने वाले की बात को समझ सके। हिंदी से सहज और सक्षम कोई और माध्यम मुझे दिखाई नहीं देता। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो जैसे कि चीन में सारे कार्य चीनी भाषा में किए जाते हैं। यूरोप व पश्चिमी देशों में अंग्रेजी भाषा में सभी कार्य किए जाते हैं। तो हम हिंदी को पूर्ण रूप सेे अपने राष्ट्र की कामकाज की भाषा क्यों नहीं बना सकते। ऐसा करने से ना सिर्फ कार्य जल्दी होगा बल्कि ग्रामीण स्तर से शहरी स्तर तक किए गए कार्य को एकीकृत रूप में देखा जा सकेगा। राष्ट्रीय स्तर पर समस्त आंतरिक कार्यों को हिंदी में करने का दृढ़ता पूर्वक समर्थन करती हूं। सभी विभाग चाहे वह कॉरपोरेट जगत से हों या अन्य, हिंदी में कार्य करने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे हमारी राष्ट्रीयता के प्रति जागरूकता को भी बल मिलेगा। ठीक ही कहा गया है कि हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा। इसे एक दीर्घकालीन प्रक्रिया के रूप में समझने की आवश्यकता है।
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विश्व की सबसे शक्तिशाली दस भाषाओं में एक है हिंदी, बढ़ाती है हमारा मान: डॉ.नेहा मिश्रा
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में समाज कार्य विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.नेहा मिश्रा ने बताया हिंदी विश्व की सबसे शक्तिशाली दस भाषाओं में गिनी जाती है। जहां चीनी भाषा बोलने वाले लोग जनसंख्या में पहले क्रमांक में आते हैं वहीं, हिंदी विश्व की दूसरी सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा है। भारत के साथ-साथ नेपाल, मॉरिशस, बांग्लादेश आदि स्थानों पर भी हिंदी का प्रभाव है। 2001 की भारतीय जनगणना में भारत में 42 करोड़ 20 लाख लोगों ने हिंदी को अपनी मूल भाषा बताया। अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, यमन, युगांडा, सिंगापुर, जर्मनी में भी बड़ी संख्या में हिंदी भाषी हैं। न्यूजीलैंड में हिंदी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी बोलने और समझने में अत्यंत सरल है। इसे बोलने में और सीखने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। लोग तरह-तरह की भाषाएं खूब सीखें पर सम्मान शीर्ष पर हिंदी को ही दें। ये हमारा दायित्व है। हर अच्छे संस्कार की शुरुआत घर पर ही होती है। आस-पड़ोस, स्कूल-कॉलेज सब जगह जब हिंदी रच बस जाएगी तो उसे उसका सम्मान मिलेगा।
हम हिंदी में करें संवाद, सामने वाला खुद मातृभाषा में देगा जवाब
भारत में सबसे ज्यादा जो भाषा बोली और समझी जाती है वह हिंदी है। इसका जन्म संस्कृत से हुआ और यह विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं में एक है। दुर्भाग्य यह है जब हमलोग अपनी मातृभाषा का महत्व भूल रहे हैं, कई अन्य देशों में हमारी हिंदी को उचित सम्मान और मान्यता दी जा रही है। हम पर तो इसका दर्जा बढ़ाने और गर्व करने की जिम्मेदारी सर्वाधिक है। इसके लिए युवाओं को आगे आना होगा। जहां भी संवाद की, लेखन की जरूरत हो हम हिंदी का ही उपयोग करें। जब हम हिंदी में शुरुआत करेंगे तो सामने वाला कितना ही अंग्रेजी परस्त क्यों न हो थोड़ी देर बाद वह हिंदी में ही उत्तर देगा। धीरे-धीरे यह सिलसिला समाज का हिस्सा बन जाएगा।

डॉ. रविंद्र शुक्ला। - फोटो : DEHAT

असमा खान। - फोटो : DEHAT

नेहा मिश्रा। - फोटो : DEHAT

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