झांसी। झांसी और ललितपुर जनपद में अस्थमा के 80 हजार मरीज हैं। वातावरण में लगातार बढ़ता प्रदूषण सांस के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ा रहा है। इसके अलावा अनुवांशिक मरीजों की संख्या भी खासी है। इस बीमारी को शुरुआत में नजरअंदाज करना लोगों को भारी पड़ रहा है।
वातावरण में लगातार बढ़ते प्रदूषण की वजह से अस्थमा के रोगियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इस बीमारी को दमा भी कहते हैं। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें सांस की नली में सूजन आ जाती है और इसी के कारण लोगों को सांस लेने में परेशानी होने लगती है। सर्दियों में इस बीमारी से पीड़ितों की संख्या खासी बढ़ जाती है। झांसी और ललितपुर में अस्थमा के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार क्रशरों से निकलने वाली धूल, थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले राख के महीन कणों को माना जाता है। इसके अलावा गाड़ियों से निकलने वाला धुआं व खुले में हो रहे भवन निर्माण के कार्य भी अस्थमा के लिए मुफीद माहौल पैदा करते हैं। वहीं, ये बीमारी लोगों को अनुवांशिक भी मिलती है। ऐसी मरीजों की भी यहां खासी तादाद है।
पहचानें इन लक्षणों को
- बार-बार खांसी आना
- सांस लेते समय सीटी की आवाज आना
- बगैर थके हुए या थोड़ा सभी चलने पर सांस फूलना
- सीने में जकड़न और भारीपन
- सुबह और शाम के समय ज्यादा बढ़ जाती है परेशानी
ऐसे कर सकते हैं बचाव
- जंक फूड से दूरी बनाए रहें
- ठंडा पानी व ठंडी चीजों से भी करें परहेज
- सर्दियों में बेहतर हो कि गुनगुने पानी का करें प्रयोग
- धूल, धुएं और प्रदूषण से दूरी बनाए रखें
- लक्षण सामने आने पर शुरूआत में ही चिकित्सक से करें संपर्क
अस्थमा के पचास प्रतिशत मरीज अनुवांशिक होते हैं, जबकि बाकी में ये बीमारी वातावरण के दुष्प्रभाव से हो जाती है। शुरूआत में ही इलाज शुरू कर इस बीमारी पर आसानी से अंकुश पाया जा सकता है।
- डा. जकी सिद्दीकी, असिस्टेंट प्रोफेसर - महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज
क्षेत्र में सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनसरी डिजीज) के मरीज बहुतायत पाए जाते हैं। ये भी अस्थमा की एक शाखा है। शुरूआत में इसे नजरअंदाज करना रोग को गंभीर बना सकता है।
- डा. राजीव जैन, फिजिशियन