करीब डेढ़ सौ साल पुरानी जिला जेल के कर्मचारी जान जोखिम में डालकर जर्जर आवास में रहने को विवश हैं। जेलर समेत सभी बंदी रक्षकों के आवास इस कदर जर्जर हो गए हैं कि बारिश का पानी छत से अंदर टपकता है। पूरे आवास में सीलन है और दीवारों से प्लास्टर उखड़ गए हैं। आवास की दीवारें भी जर्जर हो गई हैं। शहर के बाहर नई जेल बनाने प्रक्रिया शुरू होने के चलते बंदी रक्षकों के जर्जर हुए आवासों की मरम्मत भी नहीं कराई जा रही है।
जर्जर आवासों में रह रहे एक बंदी रक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि तेज बारिश होने पर छत से पानी अंदर टपकता है। पानी फर्श पर न फैले, इसके लिए कमरे में जहां पानी टपकता है वहां बाल्टी या अन्य कोई बर्तन रख दिया जाता है। आवास इतना जर्जर हो गया है कि कब ढह जाएगा, इसका भी कोई भरोसा नहीं है। छत में लगा प्लास्टर कई जगह से टूट टूटकर गिर चुका है। आवास जर्जर होने के कारण बच्चों का दाखिला गांव के स्कूल में कराना पड़ा है। बंदी रक्षकों के सरकारी आवास के अलावा शौचालयों की स्थिति बदहाल है। एक अन्य बंदी रक्षक का कहना है कि वह जेल की नौकरी जरूर कर रहे हैं, लेकिन यह नौकरी जेल की सजा जैसी हो गई है। कमरों में सीलन के कारण अजीब सी स्मेल कमरे में रहती है। इससे ठीक से नींद भी नहीं आती है। जेल अधीक्षक एसके पांडेय का कहना है कि शासन ने निर्देश दिया है कि रजिस्ट्री वाले पैसे से ही एक फीसदी शुल्क देकर बैनामा कराया जाए। आखिरी एक-दो किसानों के जमीन के बैनामा में जो धनराशि कम पड़ेगी, उसके लिए फिर से बजट जारी किया जाएगा। इस निर्देश के बाद बैनामा की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सभी किसानों की जमीन की रजिस्ट्री हो जाने के बाद जेल के निर्माण की प्रक्रिया के लिए अन्य औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।