यज्ञोपवीत संस्कार में मौजूद बटुक।
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उरई। आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में शुक्रवार को 26वां यज्ञोपवीत संस्कार कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसमें 46 बटुकों का यज्ञोपवीत (जेनऊ) संस्कार पूरे विधि विधान और वैदिक परंपरा के अनुसार हुआ।
सुबह पांच बजे से ही यज्ञोपवीत संस्कार की तैयारी शुरू हो गई थी। सुबह साढ़े पांच बजे बटुकों का मुंडन संस्कार हुआ। इसके बाद बटुकों का सामूहिक भोज हुआ और सभी बटुक वैदिक मंत्रों की ध्वनि के बीच यज्ञ मंडप में प्रवेश किए। जहां गणेशपूजन आदि का अन्य वैदिक कार्यक्रम हुए। आचार्य डॉ. पूर्णेंद्र मिश्रा ने सभी बटुकों के यज्ञोपवीत संस्कार कराया और उनके कानों में मंत्र पढ़ा। आचार्य शालिगराम शास्त्री ने यज्ञोपवीत संस्कार का महत्व बताया। कहा कि हर व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है पर कर्म के अनुसार उसकी जाति विभाजित होती है। यज्ञोपवीत धारण करने वाले मनुष्य को कई नियम का पालन करना होता हैं। तभी यज्ञोपवीत संस्कार का महत्व होता है। यज्ञोपवीत के बाद तालाब में स्नान वर्जित हो जाता है। महिलाओं के पास बैठने में भी मनाही हो जाती है। ब्रह्मचर्य जैसे नियमों का पालन करना होता है। अपने गुरू और माता पिता के साथ बड़ों का भी सम्मान करना होता है।
कार्यक्रम संयोजक अवनीश चंद्र द्विवेदी ने बताया कि महाविद्यालय में हर साल वसंत पंचमी के दिन सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इस साल वसंत पंचमी के दिन यज्ञोपवीत का मुहूर्त न होने के कारण माघ शुल्क की तृतीया को ही शुक्रवार को यज्ञोपवीत संस्कार कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यज्ञोपवीत संस्कार के बाद सभी बटुकों ने बैंडबाजों के साथ मंदिरों में गए और अपने परिजनों से भिक्षा भी मांगी। इस दौरान विनोद मिश्रा, शिवविशाल चतुर्वेदी, रोहित चतुर्वेदी, मोहित मिश्रा, अंकित दीक्षित, राघवेंद्र भूषण द्विवेदी, मोहित चतुर्वेदी, राजकुमार आदि मौजूद रहे।