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डकैतों के फरमान से ही कभी बना करते थे प्रधान

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रामपुरा के बिलौड़ गांव में डकैत पहलवान का चबूतरा - फोटो : ORAI
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उरई। आज भले ही पंचायत चुनाव के दौरान मतदान केंद्र छावनी में तब्दील नजर आते हो लेकिन अस्सी और नब्बे के दशक का वह दौर था, जब जनपद का बीहड़ इलाका डकैतों की गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजा करता था। बीहड़ के जंगलों की यह गूंज आसपास के गांवों तक सुनाई देती थी। यही वजह थी कि गोलियों की गूंज की तरह ही डकैतों के फरमान को भी न सिर्फ सुनना बल्कि उसे मानना ग्रामीणों की मजबूरी हुआ करती थी। पंचायत चुनाव के वक्त डकैतों के फरमान पुलिस और प्रशासन की कवायद पर इस कदर भारी पड़ते थे कि गांव की प्रधानी की कुर्सी बैलट की बजाए बुलेट तय करती थी। रामपुरा और कालपी के बीहड़ इलाकों के ग्रामीण आज भी जब कुख्यात डकैतों के आतंक को याद करते हैं तो उनकी जुबां खामोश और आंखों मेें खौफ नजर आने लगता है। सिर्फ इतना ही कह पाते हैं कि ‘तब तो डाकुअन की ही सरकारें चलती राहें।’
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बता दें कि 2005 तक जनपद जालौन के साथ साथ सीमा से लगे जिले औरैया, इटावा और एमपी के भिंड में डकैतों के गिरोहों का बोलबाला था। कुछ गिरोह तो ऐसे थे, जिन पर राजनीति से जुड़े लोगों का भी वरदहस्त रहता था। हत्या, लूट और अपहरण का कारोबार करने वाले इन डकैत गिरोह का ग्रामीणों इलाकों में इस कदर बोलबाला था कि न सिर्फ राशन-पानी का इंतजाम ही ग्रामीण किया करते थे बल्कि पंचायत चुनाव में तो गिरोह के सरगना की एक आवाज पर पूरे के पूरे गांव के वोट एक ही प्रधान प्रत्याशी की झोली में गिरा करते थे।
मंदिर, चबूतरे और टीलों से जारी होते थे फरमान
किसे प्रधान बनना है और किसे नहीं, इसे तय करने के लिए चुनाव के वक्त बीहड़ के जंगलों में गांवों के चुनिंदा लोगों के साथ डकैतों की पंचायत शुरू हो जाया करती थी। पंचायत में फैसला होने के बाद किसी प्रमुख टीले, मंदिर अथवा चबूतरे से निर्धारित दिन गिरोह के सरगना अपना फरमान सुनाते थे। रामपुरा के बिलौड़ गांव में डकैत सलीम उर्फ पहलवान का चबूतरा आज भी स्थित है। कालपी में भी यमुना के किनारे स्थित टीले डकैतों के फरमान जारी करने के ठिकाने हुआ करते थे। ं
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विरोधियों को चुकानी पड़ती थी भारी कीमत
डकैत गिरोह के फरमान के आगे न झुकने वालों को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ती थी। चुनाव के दौरान विरोधी के न मानने पर गिरोह के सरगना स्वयं ही अपने गिरोह के साथ उसके घर पहुंचकर धमकाते थे। कई बार तो धमकी से भी काम न बनने पर विरोध में चुनाव लड़ने वालों के परिजनों तक को अगवा कर लिया जाता था। फिर वह ‘पकड़’ या तो विरोधी के चुनाव से हटने पर या फिर मोटी रकम अदा करने के बाद ही गिरोह के चंगुल से छूटा करती थी।
ये थे मुख्य डकैत सरगना
जनपद में अपना आतंक जमाने वाले डकैत गिरोह के सरगनाओं में प्रमुख रुप से फूलन देवी, निर्भय गूजर, बाबा मुस्तकीम, लालाराम, श्री राम, फक्कड़ बाबा, विक्रम सिंह, राजू सतरैजू, राजकिशोर, जगजीवन परिहार और सलीम उर्फ पहलवान कुछ ऐसे नाम हैं, जिनके फरमान के आगे किसी की नहीं चलती थी। पंचायत के चुनाव इन सरगनाओं के लिए किसी सहालग से कम नहीं रहते थे। कई सियासी दलों के नेता भी इनकी मदद के बगैर ग्रामीण इलाकों में अपने दल का झंडा नहीं लगा पाते थे।
इन ग्रामीण इलाकों में बजता था डंका
कालपी क्षेत्र के मगरौल, मदरा लालपुर, पडऱी, नरिहान, देवकली, कीरतपुर, हीरापुर, मैनूपुर, गुढ़ा खास, शेखपुर बुजुर्ग, गुलौली, सिमरा शेखपुर आदि गांवों में डकैतों की तूती बोला करती थी। इसी तरह माधौगढ़, रामपुरा क्षेत्र के बिलौड़, हुकूमपुरा, जायघा, कर्रा, मोहब्बतपुरा, नरौल, निनावली, कुसेपुरा, कदमपुरा, झरैला, असहेना, मचकछा, टिलिया, करमरा आदि गांवों में डकैतों का खासा दबदबा रहा करता था। चुनाव के वक्त गिरोह के सदस्यों का इन गांवों की ओर आना जाना काफी बढ़ जाता था।
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