मुहम्मदाबाद। दीपावली पर डकोर में एक दिवसीय दिवारी नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें हमीरपुर व जालौन की टीमों ने प्रतिभाग लिया। जबकि डकोर क्षेत्र की 12 टीमों ने प्रतिभाग किया। प्रतियोगिता में जालौन के गांव कुसमिलिया प्रथम और जिला हमीरपुर बरौली ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्व सांसद डा. चंद्रपाल यादव ने किया।
कस्बा डकोर में आयोजित चाचर दीवारी नृत्य प्रतियोगिता में चिकासी, बरौली हमीरपुर, मुहम्मदाबाद, रमपुरा, काहटा, जैसारी खुर्द की एक-एक टीम कुसमिलिया से दो टीम एवं डकोर की तीन टीमों ने दिवारी नृत्य में दमखम दिखाया। सबसे पहले डकोर की टीम ने दिवारी नृत्य में टीम के युवाओं के कंधों पर नसैनी रखकर हैरतअंगेज करतब दिखाए। इसके बाद कुसमिलिया की टीम ने लाठी, मारू, ढाल एवं सैला आदि से करतब दिखाकर दर्शकों की तालियों का अभिवादन स्वीकारा। सभी टीमों ने अलग-अलग दीवारी नृत्य कर प्रदर्शन किया। इस प्रतियोगिता में कुसमिलिया प्रथम को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर कप्तान अंकित को 21000 हजार रुपये उपहार स्वरूप भेंट किए गए। वहीं दूसरे स्थान पर बरौली द्वितीय के कप्तान कृपाल को 11000 रुपये भेंट में दिए गए। तृतीय स्थान डकोर ने पाया। इस मौके पर पूर्व सांसद ने कहा बुंदेलखंड की पुरानी परंपरा आज भी कायम है। दीवारी नृत्य करने वाले प्रेमी इस परंपरा को जिंदा रखे हैं। ऐसे आयोजन होते रहना चाहिए। इससे जात, पात, ऊंच.नीच खत्म होती है और एकता बढ़ती है। इसके बाद टीम के सभी कप्तानों मुसब्बर खां, रामऔतार, बृजेन्द्र पाल, गजराज, भानू अहिरवार, कारीगर, अमर सिंह को मुख्य अतिथि ने उपहार बांटकर उनका उत्साह बढ़ाया। निर्णायक मंडल में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष शिशुपाल सिंह यादव, छत्रपाल यादव, अतुल यादव, प्रधान सोनू यादव, भरत यादव, अंजनी महाते, धर्मेंद्र यादव आदि रहे। इस मौके पर पूर्व प्रधान बीर सिंह राजपूत, मनोज यादव दीपू यादव पिंटू यादव, दिलीप, सुशील, पप्पू तिवारी समेत सैंकड़ों लोग मौजूद थे।
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दिवारी नृत्य का विशेष महत्व
मुहम्मदाबाद। अपनी लोक संस्कृति के लिए विख्यात बुंदेलखंड इलाके में दीपावली का त्योहार काफी रोमांचक होता है। यहां परंपरागत दीवारी नृत्य की धूम मची रहती है। इसमें ढोलक की थाप पर थिरकते लोग लाठियों से अचूक वार करते हुए युद्ध कला को दर्शाते है। नृत्य को देख लोग दंग रह जाते हैं। युवाओं को दीवाली नृत्य करते देख ऐसा प्रतीत होता है मानों वे दीवारी नृत्य नहीं, बल्कि युद्ध का मैदान जीतने निकले हों। धनतेरस से लेकर दीपावली और भाईदूज पर युवाओं की टोलियां गांवों से लेकर शहरों तक घूमती नजर आती हैं। दीवारी नृत्य देखने को हजारों लोग जुटते हैं। दीपावली खेलने वाले लोग इस कला को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ग्वालों को सिखाई गई आत्मरक्षा की कला मानते हैं। दीपावली पर्व पर ग्रामीण अंचलों में इस नृत्य का बड़ा प्रचलन है।