भुंजरियां विसर्जित करने जातीं बालिकाएं
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जालौन। अच्छी फसल एवं सुख-समृद्धि की कामना के लिए रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरिया पर्व मनाया गया। इस बार कोविड 19 के चलते कजली मेला तो नहीं लगा। लेकिन लोगों ने एक दूसरे के घर जाकर भुजरियां दी। शाम को नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित जल स्रोतों में गेहूं के पौधों (भुजरियों) का विसर्जन किया जाता है।
गृहिणी अनुराधा पोरवाल ने बताया कि सावन के महीने की अष्टमी और नवमी को छोटे-छोटे पात्रों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या जौ के दाने बोए जाते हैं। इसके बाद इन्हें रोजाना पानी दिया जाता है। सावन के महीने में इन भुजरियों को झूला देने का रिवाज भी है। तकरीबन एक सप्ताह में ये अन्न उग आता है, जिन्हें भुजरियां कहा जाता है। इन भुजरियों की पूजा-अर्चना की जाती है एवं कामना की जाती है कि बारिश बेहतर हो, जिससे अच्छी फसल मिल सकें। श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। रक्षाबंधन के दूसरे दिन इन्हें एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद देते हैं।
रक्षाबंधन के दूसरे दिन गांवों के बाहर सजी संवरी महिलाएं, पगडंडियों पर चलकर तालाब और पोखरों पर भुजरियों को विसर्जित करने के लिए पहुंची। जहां उन्होंने देशी गीत को गाकर तालाबों और पोखरों में भुजरियों को विसर्जित किया। लोगों ने एक दूसरे घरों पर जाकर उन्हें भुजरियां देकर शुभकामनाएं दी। कोविड 19 के चलते नगर के दीनदयाल उपाध्याय चौराहे पर रक्षाबंधन के दूसरे दिन लगने वाला कजली मेला इस बार नहीं लगा।
लोकपर्व इतिहास के आल्हा खंड से जुड़ा हुआ
कोंच संवाद के अनुसार बुंदेलखंड का यह लोकपर्व इतिहास के आल्हा खंड से जुड़ा हुआ है। बुंदेलखंड की इस लोक परंपरा के बारे में प्रचलित है कि चंदेलकाल में राजा पृथ्वीराज चौहान ने जब महोबा पर आक्रमण किया था तब आल्हा और उनके भाई ऊदल महोबा में नहीं थे। रक्षाबंधन के दिन राजा पृथ्वीराज की सेना ने महोबा को घेर रखा था इस कारण रानी मल्हना भुजरियों का विसर्जन नहीं कर पाईं थीं। अगले दिन जब आल्हा-ऊदल आए तब उन्होंने पृथ्वीराज को युद्ध में हराया। जिसके बाद भुजरियों का विसर्जन रानी कर सकी थीं इसलिए इस पर्व को बुंदेलखंड की लोक परंपराओं में बासी भुजरियां भी कहा जाता है।