भारत में 2014 का लोकसभा का चुनाव चल रहा है। यहां के कुछ क्षेत्रों में मतदान समाप्त हो चुका है, कुछ क्षेत्रों में अभी मतदान होना बाक़ी है।
बसपा, कांशीराम का बनाया राजनीतिक दल है जिसमें दलितों की राजनीतिक सहभागिता अन्य दलों से बहुत ज्यादा है। एक दलित की बेटी के रूप में मायावती के हाथों में इसका नेतृत्व है। अभी हाल ही में कांशीराम की अंग्रेज़ी में जीवनी ‘कांशीराम: लीडर ऑफ़ द दलित’ आई है।
कांशीराम की जीवनी लिखते वक्त मैंने देखा था कि किस प्रकार कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में न केवल दलित जातियों को संगठित एवं जागरुक किया था, बल्कि उन्होंने ‘बहुजन’ वाद से दलित, पिछड़ावर्ग और पिछड़े मुस्लिम सामाजिक समूहों का एक सामाजिक एवं राजनीतिक गठजोड़ बनाने का प्रयास किया था। जिसमें कुछ हद तक वे सफल भी हुए थे।
पिछड़ी जातियां और बसपा
एक समय बसपा से दलित जातियों के साथ ही पटेल, कुर्मी एवं अति पिछड़ी जातियों में पाल, पनेरी, कुशवाहा, तेली, निषाद, मल्लाह, केवट, नोनिया, भुर्जी, बारी, नाई, शाक्य, सैनी चौरसिया, राजभर आदि जातियां जुड़ीं थीं।
मुलायम सिंह यादव के साथ बसपा का गठजोड़ टूटने के बाद भी ये जातियां काफी समय तक बसपा से जुड़ी रहीं। इस बीच कांशीराम की मौत के बाद मायावती की सोशल इंजीनियरिंग में ब्राह्मण, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में अप्रासांगिक होने लगे थे, महत्वपूर्ण हो उठे।
वस्तुतः मंडल राजनीति के बाद के माहौल में कांग्रेस से ब्राह्मणों का मोहभंग हुआ था और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जिससे वे जुड़े थे, वह उत्तर प्रदेश में शक्तिहीन हो गई थी, ऐसे में बसपा ने उन्हें महत्व दिया। फलतः उनका एक बड़ा हिस्सा 2007 के विधानसभा चुनाव में उससे जुड़ गया था।
प्रदर्शन दोहरा पाएगी बसपा?
2014 के चुनाव में ग़ैर-यादव पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा भाजपा के मोदी के रूप में ओबीसी कार्ड दिये जाने के कारण भाजपा की ओर आकर्षित है, तो बसपा की ओर दलितों और ब्राह्मणों का एक खास वर्ग और मुसलमान मत आकर्षित हुए हैं।
बसपा ने उत्तर प्रदेश में इस बार ब्राह्मण जाति के सर्वाधिक 21 उम्मीदवार उतारे हैं। मायावती ने मुसलमान समुदाय के 19 उम्मीदवारों को टिकट दे, उनके मतों के लिए दावा ठोका है।
फिर भी मुसलमान भाजपा को हराने के लिए कहीं बसपा, कहीं सपा, कहीं कांग्रेस को वोट देता दिखता है, ऐसे में संभावना है कि मायावती अपने 2009 के प्रदर्शन के आस-पास ही रहेंगी।
क्या दलितों ने छोड़ा माया का साथ?
मीडिया में यह व्यापक चर्चा है कि मायावती का ‘दलित आधार मत’ उनसे दूर हुआ है। किन्तु गहराई से देखें तो लगता है कि उत्तर प्रदेश में 21.6 प्रतिशत के आस-पास के दलित जनमत का ज़्यादातर हिस्सा अब भी मायावती के पक्ष में पूरी तरह जुटा है। उत्तर प्रदेश की लगभग 36 से 40 सीटों पर दलित मत निर्णायक हैं।
दलितों में कुछ छोटी जनसंख्या वाली जातियां लगभग 20 साल के आस-पास के कांशीराम-मायावती के नेतृत्व में चले बहुजन उभार के बाद भी विकास एवं राजनीति में अपनी समुचित भागीदारी न होने के कारण उनसे भले ही नाराज़ हों, किन्तु उनका भी मत किसी एक दल की तरफ़ ध्रुवीकृत होता नहीं दिख रहा है।
ऐसे दलित मत कई राजनीतिक दलों में विभाजित हो रहे हैं। कहीं-कहीं बसपा के स्थानीय नेताओं एवं उम्मीदवारों के प्रति नाराज़गी के कारण भी दलित मत बिखर रहे हैं, लेकिन उनका प्रतिशत बहुत छोटा है।
कांग्रेस के खिलाफ थे काशीराम
बसपा और मायावती दलित मत की अपनी क्षति नए सामाजिक समूहों को अपने से जोड़कर पूरा कर रही हैं। इस क्रम में मुसलमान मतों का अच्छा ख़ासा प्रतिशत उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मिला है ऐसी संभावना जताई जा रही है।
देखना यह है कि क्या बसपा इन नये सामाजिक समीकरणों से इतने वोट हासिल कर लेती है, जिससे टूटे हुए ब्राह्मण मत, कुछ दलित मत और ओबीसी मतों की अपनी क्षतिपूर्ति कर पाती है और तथाकथित ‘मोदी लहर’ में भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कर पाती है कि नहीं।
कांशीराम जिस कांग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपनी पार्टी विकसित कर रहे थे, उसी दल की राजनीति में जब सोनिया गांधी सक्रिय हो रही थीं, तो उनके प्रति आशा से देखते हुए उनकी राजनीतिक क्षमता की प्रशंसा भी कर रहे थे।