कछौना। एक दौर था जब नारी को अबला कहा जाता था लेकिन अब बदले हालातों में वह सबला हो गई हैं। शक्तिशाली के साथ सामर्थ्यवान भी हो गई हैं। रसोई संभालने की जिम्मेदारी के साथ ही परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में भी नारी योगदान करने लगी हैं। संडीला तहसील क्षेत्र के कछौना कस्बे की एक महिला ने न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर किया बल्कि 40 महिलाओं को हुनरमंद बनाकर उन्हें भी स्वावलंबी बनाया। महिला के नेतृत्व में बनने वाले उत्पाद अब बड़े-बड़े ऑनलाइन शॉपिंग एप पर भी उपलब्ध हैं।
कछौना कस्बे में गौसगंज मार्ग पर निर्मला रहती हैं। कुछ साल पहले तक निर्मला भी घरेलू महिला थीं। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन कुछ कर गुजरने का जज्बा और हिम्मत दोनों ही थीं। निर्मला ने सिलाई और कढ़ाई के साथ बुनाई भी सीखी। घरेलू महिलाओं से ही इन कलाओं में पारंगत होने के बाद समुदाय शक्ति सेवा समिति के नाम से स्वयं सहायता समूह बनाया। इसका पंजीकरण हुआ और वह महिलाओं को घरों में उपयोग होने वाले छोटे-छोटे उत्पादाें को बनाना सिखाने लगीं।
महज सात साल में ही अब वह 40 महिलाओं को प्रशिक्षित करने के बाद अलग-अलग 18 प्रशिक्षण केंद्र खोल चुकी हैं। इन प्रशिक्षण केंद्रों पर चार हजार महिलाएं काम करती हैं। प्रत्येक महिला लगभग छह हजार रुपये महीने तक कमा लेती है और निर्मला तो अब आर्थिक स्थिति को बेहतर कर ही चुकी हैं।
यह उत्पाद बनते हैं
झोला, टोकरी, पेन स्टैंड, लॉन्ड्री वाशकिट, पेन स्टैंड, बच्चों के खिलौने, हैंडी बास्केट, ज्वेलरी, जूट बैग, टेबल स्टैंड, टेबल कवर।
मूंज और निष्प्रयोज्य सामग्री का होता इस्तेमाल
समूह की ओर से जो उत्पाद बनाए जाते हैं उनमें मूंज और निष्प्रयोज्य प्लास्टिक वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता है। पराली का उपयोग भी वह अपने उत्पाद बनाने में करती हैं। पराली की नरई से भी कई उत्पाद बनाए जाते हैं।