मिहुना गांव में पौध का निरीक्षण करते कृषि वैज्ञानिक डा. प्रशांत कुमार व साथ में युवा किसान सौरभ द?
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हमीरपुर। बीएससी और बीएड करने के बाद भी सरकारी नौकरी न मिलने पर सुमेरपुर के मिहुना गांव निवासी युवा किसान सौरभ द्विवेदी ने कश्मीर के बेर की बागवानी कर अच्छी कमाई शुरू कर दी। युवक के इस काम में बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय और केवीके कुरारा की मदद की। कृषि विभाग का मानना है कि बेर की बागवानी बुंदेलखंड के लिए वरदान साबित हो सकती है। यहां की जलवायु इसके लिए मुफीद है।
सौरभ द्विवेदी ने एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में लखनऊ व कोलकाता से कश्मीर के बेर की 600 पौध मंगाकर रोपण किया। 10 पेड़ नासपाती, 11 पेड़ आलूबुखारा, 10 अंजीर, 15 आम के पौधे लगाए हैं। सौरभ द्विवेदी बताते हैं कि बीएससी व बीएड करने के बाद नौकरी के लिए प्रयास किए लेकिन हर बार मात खाने के कारण चयन नहीं हो सका। छोटे भाई ईशू ने उसे यूट्यूब चैनल पर बेर की खेती का वीडियो देखा। इसके बाद केवीके कुरारा व बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय जाकर उसकी जानकारी ली। कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रशांत के मार्गदर्शन में लखनऊ व कोलकता से बेर की पौध मंगाकर वर्ष 2020 अक्तूबर माह में रोपण किया था।
सौरभ ने बेर की बागवानी के लिए दो प्रकार की प्रजातियों का चयन किया। इसमें थाई व कश्मीरी एप्पल 300-300 पौधे लाकर एक हेक्टेयर में रोपित किए थे। थाई एप्पल बेर हरा और कश्मीरी एप्पल सेब के कलर का होता है। प्रथम वर्ष 20-25 किलो उत्पादन प्रति पौधे के हिसाब से प्राप्त हुआ था। यह कानपुर मंडी में 50-60 रुपये प्रति किलो की दर से भाव मिल जाता है। 10 क्विंटल बेर यहीं के व्यापारी खरीद ले गए। पहले साल 50 हजार रुपये की बिक्री कर ली थी।
बुंदेलखंड की जलवायु में बेर की बागवानी किसानों के लिए फायदेमंद है। यह उष्ण व सूखे जलवायु की फसल है। इसमें सूखे से लड़ने की विशेष क्षमता होती है। इसे सामान्य मिट्टी के साथ-साथ हल्की क्षारीय व लवणीय भूमि में आसानी से लगाया जा सकता है।
-डॉ. प्रशांत कुमार, कृषि वैज्ञानिक