जिला महिला अस्पताल में बेड पर लेटी बच्ची के साथ मां सरिता
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नवरात्र महोत्सव पर मां भगवती के रूपाें की लोग बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना करने में जुटे हैं। मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए कुछ भक्तगण निर्जला व्रत रखे हैं।
जिला महिला चिकित्सालय में इस नवरात्र महोत्सव पर अमर उजाला ने पड़ताल की तो नवरात्र में एक अक्तूबर से रविवार तक जन्मे बच्चों का लिंगानुपात बराबरी में पहुंचता दिख रहा है। यह नवरात्र के दौरान नवजातों के जन्म लेने वाले आंकड़ों से देखा जा सकता है। इन आठ दिनों में जहां 43 कन्याओं ने जन्म लिया वहीं 44 बेटे पैदा हुए। वहीं रविवार को अष्टमी पर आठ नवजातों में पांच कन्याओं का जन्म हुआ। पैदा हुई कन्याओं के अभिभावकों ने बातचीत में कहा कि बेटा और बेटी में कभी मतभेद नहीं करना चाहिए। नवरात्र में कन्या जन्म शुभ संकेत से कम नहीं है।
जिला महिला अस्पताल की चिकित्सक डा.पूनम सचान का कहना है कि वह अस्पताल में आने वाले लोगों को हमेशा जागरूक करतीं हैं और लोगों को बेटी की परवरिश में किसी प्रकार का भेदभाव न करने की सलाह देती हैं। कहतीं है कि वह अपनी पांच वर्ष की बेटी काव्या सचान को बेटे से कम नहीं मानती और उसकी हर सुख सुविधा का ख्याल रखतीं हैं। जिला महिला अस्पताल में भर्ती बिदोखर निवासी रामभगत सैनी की पत्नी सविता नवजात कन्या को सुबह सात बजे जन्म देने के बाद बेसुध मिली। अस्पताल में मौजूद रामभगत ने कहा कि यह उनकी दूसरी बेटी है। पहली बेटी खुशी तीन वर्ष की हो चुकी है। कहा कि वह बेटा बेटी में भेद नहीं मानते हैं। उन्हें नवरात्र पर कन्या मिलने से खुशी दोगुनी हो गई है। स्वासा निवासी धीरेंद्र की पत्नी गुड़िया ने पहली बार में बच्ची को जन्म दिया। गुड़िया की देखभाल में लगी सास जयदेवी ने बताया कि नवरात्र के अवसर पर उनके घर में कन्या नहीं साक्षात देवी के रूप में मां आई है। कन्या के आने से वही नहीं बल्कि पूरा परिवार बेहद रोमांचित है। उसने कहा कि वह खेती किसानी कर जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन पौत्री की शिक्षा दीक्षा में कोई कमी नहीं रखेंगी। डिमुंहा निवासी राजकुमार पत्नी रोशनी ने शनिवार रात बेटी को जन्म दिया। वह उसे आंचल से चिपकाए लेटी मिली। जैसे ही बच्ची पैदा होने पर बातचीत शुरू की तो रोशनी बोल पड़ी कि नवरात्र में पहली संतान बेटी के रूप में मिली है। जिससे वह बहुत खुश है। इसका लालन पालन में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। जिला महिला अस्पताल की चिकित्सक डा.पूनम सचान का कहना है कि वह अस्पताल में आने वाले लोगों को हमेशा जागरूक करतीं हैं और लोगों को बेटी की परवरिश में किसी प्रकार का भेदभाव न करने की सलाह देती हैं। कहतीं है कि वह अपनी पांच वर्ष की बेटी काव्या सचान को बेटे से कम नहीं मानती और उसकी हर सुख सुविधा का ख्याल रखतीं हैं।