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चुनावी इतिहास में अभी तक कूद चुके 209 निर्दलीय

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हमीरपुर। विधान सभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों का महत्व कम नहीं है। अभी तक वह दो बार जीत दर्ज करा चुनावी गणित बिगाड़ चुके हैं। 1952 से अब तक चुनाव में 209 निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद चुके हैं।
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आजादी के बाद पहली बार वर्ष 1952 के चुनाव में निर्दलीय तेज प्रताप सिंह ने कांग्रेस के रामगोपाल गुप्ता को हराया। जीते प्रत्याशी ने 33.71 प्रतिशत तो कांग्रेस के रामगोपाल गुप्ता को 27.15 प्रतिशत मत मिले। वहीं 1989 में निर्दलीय चुनाव लड़कर अशोक चंदेल भी 35.22 फीसदी वोट पाकर बसपा के शिवचरन प्रजापति को हरा चुके हैं। तब बसपा को 28.65 फीसदी मत मिले। वहीं 1993 में राठ विधानसभा से बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में कूदे राजनारायण बुधौलिया दूसरे नंबर पर रहे। उन्होंने 30.38 प्रतिशत वोट झटके। बसपा के ध्रूराम चौधरी को 31.78 प्रतिशत वोट मिले। बुधौलिया को बसपा प्रत्याशी से मात्र 1.40 फीसदी वोट कम मिले। वर्ष 1980 में राठ विधानसभा सीट पर हुए चुनाव में निर्दलीय बाबूलाल ने 18 प्रतिशत तो निर्दलीय फूल सिंह ने 24.36 प्रतिशत वोट पाए। सदर विधानसभा सीट में 1996 में हुए चुनाव में निर्दलीय अशोक चंदेल ने 17.07 प्रतिशत पाकर भाजपा प्रत्याशी बंशीधर सेंगर का चुनावी गणित बिगाड़ दिया था। तब इस चुनाव में बसपा के शिवचरन प्रजापति ने बाजी मारी थी।
पैसा खपाने को उतार रहे डमी प्रत्याशी
निर्वाचन आयोग द्वारा खर्च की सीमा तय कर देने के बाद से दलीय प्रत्याशी चुनावी खर्च को खपाने के चक्कर में डमी प्रत्याशी उतारते रहे हैं। 1985 में सदर विधानसभा से 12 निर्दलीय चुनावी अखाड़े में आए। तो इसी विधानसभा सीट पर वर्ष 1993 में सर्वाधिक 16 निर्दलीय चुनाव मैदान में रहे। इन चुनावों में देखा गया कि दलीय प्रत्याशी ने ही अपने परिजनों को डमी बनाकर मैदान में उतार दिया।
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