भरुआसुमेरपुर। कभी मजबूत किला रही सदर सीट पर विजय पताका फराने के लिए बसपा ने एक दशक बाद फिर पिछड़े वर्ग का प्रत्याशी उतार दिया है। रामफूल को टिकट देकर पार्टी निषाद और अनुसूचित जाति मतदाताओं के सहारे चुनावी नैया पार करना चाहती है। पिछड़े वर्ग के प्रत्याशी के जरिये ही तीन बार बसपा का हाथी यहां दौड़ चुका है। खांटी कार्यकर्ता रामफूल निषाद को उम्मीदवार बनाने से काडर के कार्यकर्ताओं में जोश भी दिख रहा है।
एक दशक पहले तक सदर सीट पर बसपा का दबदबा रहता था। वर्ष 1991 की रामलहर में भी यहां हाथी दहाड़ा। पार्टी प्रत्याशी शिवचरन प्रजापति विधानसभा पहुंचे थे। 1993 के चुनाव में प्रजापति 509 वोटों से भाजपा प्रत्याशी से हार गए थे। वर्ष 1996 और 2002 में फिर उन्होंने बसपा की पताका फहराई। प्रदेश में बसपा की लहर के बावजूद प्रजापति वर्ष 2007 में सपा के अशोक चंदेल से चुनाव हार गए। इसके बाद उनकी बसपा से दूरियां बढ़ने लगीं। वर्ष 2012 में शिवचरन बसपा छोड़ सपा मेें शामिल हो गए।
वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा ने सामान्य जाति के सर्कस कारोबारी मो.फतेह खान पर दांव लगाया था। इस चुनाव में भाजपा की साध्वी निरंजन ज्योति विजयी रहीं। फतेह खान दूसरे और शिवचरण प्रजापति तीसरे स्थान पर रहे थे। वर्ष 2017 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष संजय दीक्षित तीसरे स्थान पर रहे थे। भाजपा के अशोक कुमार सिंह चंदेल जीते और सपा के डॉ.मनोज प्रजापति दूसरे स्थान पर रहे थे। संजय दीक्षित अब सपा में हैं। एक दशक बाद फिर बसपा ने पिछड़े वर्ग से प्रत्याशी उतार दिया है। खांटी कार्यकर्ता एडवोकेट रामफूल निषाद के जरिये बसपा फिर सदर में हाथी दौड़ना चाहती है।
क्षेत्र में निषाद मतदाता निर्णायक
सदर विधानसभा क्षेत्र में निषाद मतदाता निर्णायक माने जाते हैं। भाजपा ने इसी जाति के मतदाताओं की बदौलत वर्ष 2012 व 2017 में जीत दर्ज की थी। सदर सीट पर अभी भाजपा व सपा के उम्मीदवार घोषित नहीं हुए हैं। राजनीति जानकार सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले की उम्मीद लगा रहे हैं। क्षेत्र में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या भी काफी है।