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एतिहासिक रामजानकी मंदिर में दिखती बेजोड़ नक्काशी

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हमीरपुर। सैकड़ों साल पुराने रामजानकी मंदिर की नक्काशी, कारीगरी और भव्यता पूरे बुंदेलखंड में प्रसिद्ध है। इस मंदिर में दीवारों पर संपूर्ण रामकथा और महाभारत के प्रसंग भी चित्रित हैं। जिसे देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। मंदिर में विराजमान रामजानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां अष्टधातु की हैं। मंदिर भी एक ही पत्थर पर बना हुआ दिखता है।
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मौदहा क्षेत्र की दस हजार आबादी वाला खंडेह गांव इस एतिहासिक मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह गांव सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा है। कानपुर-बांदा में अकौना रेलवे स्टेशन खंडेह का है। गांव तक जाने के लिए पक्का मार्ग है। स्टेशन से उतरते ही गांव के दर्शनीय स्थल छह फलांग की दूरी पर है। आइने-ए-अकबरी के अनुसार मुगल सम्राट अकबर के जमाने में खंडेह महल कालिंजर सरकार के अधीन इलाहाबाद सूबे में था। मुगलों के बाद यहां मराठाओं का शासन रहा। वर्ष 1909 के बांदा गाजिटियर्स के पृष्ठ-108 में ग्राम खंडेह में प्रशासनिक व्यवस्था के लिए परगना होने का जिक्र है।
वर्ष 1878 में खंडेह का इलाका नाना गोविंद राव ने ब्रिटिश हुकूमत को सौंपा था। ये भाग महोबा परगना में शामिल कर दिया गया था। पुरातन इतिहास से इस गांव का जिक्र अंग्रेजों के जमाने में ही मिलता है। गांव में सैकड़ों साल पुराना राम दरबार का मंदिर है। ये एक एकड़ क्षेत्रफल में है। मंदिर का निर्माण तत्कालीन जमींदार चंदीदीन दुबे ने कराया था। जिसमें राम-लक्ष्मण और सीता मां की अष्टधातु की बहुमूल्य मूर्तियां विराजमान है।
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नौकरी छोड़ बड़े देवबाबा बने थे पुजारी
रामजानकी मंदिर के पुजारी राकेश कुमार बाजपेयी भीष्मदेव दुबे के पारिवारिक सदस्य हैं। जो पिछले कई दशक से मंदिर की देखरेख कर रहे हैं। बताया मंदिर में बड़े देव बाबा पहले पुजारी थे जो बहुत ही सिद्ध योगी पुरुष थे। वह पहले नवाब वाजिद अली शाह लखनऊ के यहां काम करते थे। वहां से आकर मंदिर के पुजारी बन गए थे। उस जमाने में विधिवत पूजन, भोग और आरती होती थी। बताया मंदिर निर्माण में कई कथानक जुड़े हैं। मंदिर के गर्भगृह में अनेक देवी देवताओं की मूर्तियां भी विराजमान हैं। रामजानकी मंदिर विलक्षण कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है। देश में ऐसी कलाकृतियां दक्षिण व कर्नाटक और राजस्थान में विशेष रूप से मिलती है। भिन्न-भिन्न पत्थरों को मिलाकर पूरे मंदिर के निर्माण में इस तरह सेट किया गया है कि कोई पत्थरों के जोड़ को नहीं समझ सकता है। सारा मंदिर एक दृष्टि में एक ही पत्थर का बना हुआ प्रतीत होता है।
पर्यटन के रूप में मंदिर कोलाने का प्रयास तेज
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी एसके दुबे ने बताया रामजानकी मंदिर पुरातत्व के मानचित्र पर लिया जा चुका है। मंदिर में देवी-देवताओं, विविध प्रकार के पशु पक्षियों के आलेखन डिजाइन का अंकन बेजोड़ है। मंदिर के बीच दो विशाल खुला आंगन है। इससे सौ मीटर की दूरी पर एक समकालीन मंदिर भी है। सर्वराकार प्रद्युम्न कुमार दुबे ने बताया पर्यटन के रूप में मंदिर को संरक्षित कराने के लिए कार्ययोजना बनाई गई है। मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना से 50 लाख रुपये स्वीकृत होने के साथ 25 लाख रुपये अवमुक्त होते मरम्मत का कार्य शुरू हो गया है।
ग्रेनाइट पत्थर पर कृष्ण लीला के प्रसंग चित्रित
मंदिर में ग्रेनाइट पत्थर पर संपूर्ण रामकथा, महाभारत व कृष्ण लीला के प्रसंग चित्रित है। मंदिर में मरम्मत का कार्य सुखदेव सहाय व भीष्मदेव दुबे ने कराया था। संगमरमर व ग्रेनाइट पत्थरों पर की गई शिल्पकला की दृष्टि से बारीक नक्काशी और भव्यता बेजोड़ है। दक्षिण मुखी हनुमानजी की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के पुजारी राकेश कुमार बाजपेयी ने बताया चंदीदीन दुबे का वर्ष 1902 में निधन होने के बाद मंदिर वीरान रहा। नतीजतन कुछ लोगों ने मंदिर क्षतिग्रस्त कर दिया था। वर्ष 1942 में चंदीदीन दुबे के पौत्र सुखदेव सहाय दुबे ने मंदिर के शेष निर्माण कार्य पुराने और गढ़े अधगढ़े पत्थरों से कराया।
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