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कृत्रिम गर्भाधान: सफलता सिर्फ 40 फीसदी

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रखरखाव की बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कृत्रिम गर्भाधान की सफलता मात्र 40 फीसदी है। अगर पशुपालकों को उच्च गुणवत्ता वाले सीमन उपलब्ध कराकर पशुओं के हीट में आने के बाद गर्भाधान कराने का उपयुक्त समय बताया जाए तो प्रति पशु दूध की उत्पादकता में जनपद पहले नंबर पर पहुंच जाए।
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जिले में करीब 26 बायफ सेंटर स्वीकृत हैं। जिनमें करीब 18 ही संचालित हो रहे हैं। वहीं पशुपालन विभाग के 24 कृत्रिम गर्भाधान केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों में 119 स्वीकृत कर्मियों के सापेक्ष 68 की तैनाती है। वर्ष 2018-19 में करीब 45986 गाय व भैंसों का कृत्रिम गर्भधान किया गया था। जिसमें उत्पन्न संतति 14965 है।
वहीं आगामी वर्ष अप्रैल से अक्तूबर के बीच करीब 19 हजार पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान किया गया है। जिसमें उत्पन्न संतति 7058 है। हर पशुपालक की सबसे बड़ी समस्या है गाय भैंसों का गर्भाधान।
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कृत्रिम गर्भाधान पर उनका विश्वास बहुत कम है। अधिकांश पशुपालकों के मन में यह धारणा भरी है कि एक बार कृत्रिम गर्भाधान कराने के बाद अगर ठहराव नहीं हुआ तो पशु बेकार हो जाता है। इसके अलावा पशु अस्पतालों में सीमन के रखरखाव की व्यवस्था इतनी खराब है कि गर्भ ठहरने का प्रतिशत 35 से 40 फीसदी ही है।
उपमुख्य पशु चिकित्सक डा.सोम प्रकाश तिवारी का कहना है कि कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों के प्रति पशुपालकों का विश्वास जगाने के लिए अस्पतालों में बुनियादी ढांचे में और निवेश करने की जरूरत है।
कहा कि कृत्रिम गर्भाधान की विधि सस्ती और भरोसेमंद है। पर इसे अत्याधुनिक बनाने की आवश्यकता है। हीट में आने के बाद अधिकांश किसान अपने दुधारू पशु सांड या भैंसे के पास तुरंत लेकर चल देते हैं।
या फिर उसे तत्काल सीमन दिलवा देते हैं यह उचित नहीं है। इस अज्ञानता के कारण पशुओं में गर्भ न ठहरने और बार-बार गरम होने की समस्या बढ़ रही है। कहा कि अमूमन हीट में आने के बाद गाय या भैंस 20 से 24 घंटे तक गरम रहती है। इसके बीच का समय गर्भाधान के लिए सबसे उपयुक्त है।
अगर कोई पशु सुबह चार या पांच बजे हीट में आता है तो उसका शाम को इतने ही समय पर प्राकृतिक या कृत्रिम गर्भाधान कराना चाहिए। कृत्रिम गर्भाधान की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि जहां एक बुल (सांड) एक साल में 100 गायों का गर्भाधान करता है। वहीं उसका सीमन संरक्षित कर 2000 से 2500 गायों का गर्भाधान कराया जा सकता है। इसके अलावा किसी प्रकार के संक्रमण से पशु को बचाया जा सकता है।
कृत्रिम गर्भाधान के लिए गायों एवं भैंसों में कैथेडर गर्भाशय में कहां तक डाला जाए इसकी जानकारी हर पशु चिकित्सक को होनी चाहिए। पशु विशेषज्ञ ने कहा कि भैंसों का कृत्रिम गर्भाधान करने के लिए पशु डाक्टर को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
वजह यह है कि भैंसों का गर्भाशय बाहर से दिखता तो बड़ा है लेकिन अंदर बहुत छोटा होता है। 0.5 से 1.5 सेंटीमीटर के बीच ऐसे में सीमन डालते समय जैसे कैथेडर ग्रीवा (सेरविक्स) से आगे जाए।
सीमन शरीर में तुरंत डाल देना चाहिए। ग्रीवा से आगे कैथेडर डालने पर गर्भाशय के क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके उलट गायों का गर्भाशय भैंस की तुलना में बड़ा होता है। इसका आकार तीन से पांच सेंटीमीटर तक होता है। इसमें ग्रीवा से आगे भी कैथेडर चला जाए तो खतरे की बात नहीं है।
मुख्यता गाय में थारपारकर, फ्रीजियन सीमन उपलब्ध रहता है। कभी कभार साहीवाल का भी सीमन आ जाता है। वहीं भैंसों में मात्र मुर्रा नस्ल का ही सीमन उपलब्ध रहता है। कहा कि सीमन के लिए कंटेनर होते हैं। जिनमें लिक्विड नाइट्रोजन गैस भरी होती है। उसी में यह सीमन रखे जाते हैं। जो सालों खराब नहीं होते है।
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