सरकार की ओर से की गई इस कार्रवाई को लेकर चर्चा है कि जून के बाद से ही गोसदन में मृत पशुओं की डाटा इंट्री में मनमानी हुई है। यही नहीं जंगल की ओर चरने गए पशुओं के आने-जाने का भी कोई आंकड़ा गोसदन के पास उपलब्ध नहीं हैं।
इस बीच विकास कार्यों का जायजा लेने आये कमिश्नर के सामने जब अफसरों ने गोसदन के पशुओं की संख्या के बाबत अलग-अलग जानकारी दी और मौके पर मौजूद पशुओं की संख्या कम दिखी तो कमिश्नर को संदेह हुआ और उन्होंने अपर आयुक्त प्रशासन को पशु गणना की जिम्मेदारी सौंपी। अपर आयुक्त की गणना में 1623 पशु लापता मिले। जिसकी रिपोर्ट कमिश्नर से होते हुए शासन तक पहुंची।
सूबे में योगी सरकार बनने के साथ ही जिला गोसदन को लेकर जिला प्रशासन काफी गंभीर हुआ और अचानक से गोसदन की व्यवस्था को बेहतर बनाया जाने लगा। लेकिन प्रशासन की जितनी सक्रियता बढ़ी गोसदन की व्यवस्था उतनी ही बिगड़ती चली गई। चारे के लिए पांच सौ एकड़ भूमि है, लेकिन पशु भूख प्यास से दम तोड़ते गए। बीते वर्ष मंडल के विभिन्न जनपदों से भी यहां छुट्टा पशु लाए गए और देखते ही देखते दो सालों में गोसदन में गोवंशीय पशुओं की संख्या 350 से बढ़कर 2579 पहुंच गया।
इसके बाद कुछ संसाधन भी बढ़े, लेकिन मौतों का क्रम नहीं टूटा। इस दौरान गोसदन के बेहतर प्रबंधन के लिए प्रबंधक भी बदले गए। लेकिन हालात नहीं बदलें। जनवरी 2018 में एक पखवारे में 40 से अधिक गोवंशीयों की मौत की खबर से थोडे पर के लिए जिम्मेदार अफसरों की तंद्रा टूटी तो जरुर लेकिन नतीजा कुछ खास नहीं निकला।
इसके बाद जून 2019 में छह दिनों में 60 गोवंशीय पशुओं के मौत का मामला सामने आया। प्रशासन अपनी गलती छुपाने के लिए आंकडों में लीपापोती कर एक सुपरवाइजर की छुट्टी करते हुए गोसदन कर्मियों पर मीडिया से बात चीत करने पर ही रोक लगा दी।