गोरखपुर फिल्म सोसायटी और जन संस्कृति मंच की ओर से शनिवार को गोकुल अतिथि भवन में दो दिवसीय 11वें गोरखपुर फिल्म महोत्सव का आगाज हुआ। दर्शकों के सक्रिय सहयोग से आयोजित होने वाले इस महोत्सव ने न सिर्फ 11 सालों की अपनी गतिशील परंपरा बनाए रखी, बल्कि पूरे देश में फिल्म प्रदर्शन के लिए नई प्रेरणा दी।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि लाल्टू ने कहा कि इस अंधेरे वक्त में हम सब एकजुट होकर लड़ रहे हैं, यह बड़ी बात है। कथाकार मदनमोहन ने कहा कि आजादी के बाद के किसी भी समय से ज्यादा आज हमारा लोकतंत्र खतरे में है। ऐसे में अंधे युग की वापसी के खिलाफ अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र के लिए हमें एकजुट होकर संघर्ष आगे बढ़ाना होगा।
फिल्मकार राहुल रॉय और तरुण मिश्र ने भी उद्घाटन सत्र में अपने विचार रखे। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी ने सिवान के पत्रकार राजदेव रंजन और झारखंड के न्यूज चैनल के वीडियो पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह की हत्या की निंदा की। सत्र के अंत में सभी लोगों ने दिवंगत पत्रकारों के प्रति एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी। संचालन व संयोजन चंद्र भूषण अंकुर ने किया।
उद्घाटन सत्र के बाद प्रतिरोध की संगीत के तहत चार म्यूजिक वीडियो का प्रदर्शन हुआ। ‘हिटलर के साथी’, ‘चल चलिए’, संपविला देह जरि नाही (मराठी), ‘रोहित’ नाम के म्यूजिक वीडियो के प्रदर्शन को दर्शक एकटक देखते रहे। इसके बाद फिल्मों का दौर चला। जिसमें बारी-बारी से ‘कोर्ट’, ‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’, ‘माई बॉडी माई वेपन’ और ‘फैक्ट्री’ फिल्म का प्रदर्शन किया गया।
न्याय व्यवस्था की खामियां बता गई ‘कोर्ट’
चैतन्य तम्हाणे की फिल्म ‘कोर्ट’ बारीकी से न्याय व्यवस्था में खामियां उजागर कर गई। फिल्म में महाराष्ट्र के एक दलित लोकगायक को हीरो बनाया गया है। कोर्ट में उस पर महज इस बात के लिए मुकदमा चलाया जाता है कि उसने एक सफाई मजदूर को अपने गायन से खुदकुशी के लिए भड़काया था। फिल्म में अंग्रेजों के जमाने के कानून और गरीबों के लिए न्याय व्यवस्था में उपहास दिखाया गया है।
‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’ में दिखा दलितों से भेदभाव
फिल्म ‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’ में निर्देशक ने उच्च शिक्षा केंद्रों में दलित छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को दिखाया है। फिल्म में हैदराबाद यूनिवर्सिटी का दृश्य है, जहां दलित छात्र रोहित वेमुला ने खुदकुशी की थी। फिल्म के निर्देशकों में से एक नागेश्वर राव कहते हैं कि ‘मैं असहमति में उठा हाथ हूं, मैं वही नागेश्वर हूं, जो अभी भी मानवीय है।’
‘फैक्ट्री’ ने दिखाया मजदूरों का संघर्ष
राहुल रॉय निर्देशित ‘फैक्ट्री’ एक प्राइवेट कंपनी के मजदूरों के संघर्ष पर आधारित है। जहां 2011 से मजदूर अपने अधिकारों के लिए कंपनी प्रबंधन और सरकार दोनों के खिलाफ खड़े हैं। फिल्म बताती है कि पूरे देश में श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर मजदूरों के मूलभूत अधिकार छीने जा रहे हैं। इस प्रक्रिया में लगातार तेजी आ रही है।
फिल्में तर्कशील सोच को दुरुस्त करती हैं : प्रो. लाल्टू
गोरखपुर फिल्म महोत्सव के आयोजनों के क्रम में शनिवार की शाम प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी स्मृति का व्याख्यान आयोजित हुआ। इसमें मुख्य वक्ता हैदराबाद इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के प्रो. लाल्टू ने कहा कि प्रतिरोध की फिल्में हमारी तर्कशील सोच को दुरुस्त करती हैं।
देश में गरीबी और निरक्षरता की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि व्यवस्था की यह बदहाली राष्ट्र के नाम पर बर्दाश्त की जा रही है। लेकिन संकट के समय में राष्ट्र की एकांगी व्याख्या बहुत से लोगों को मुख्य धारा से अलग करती है। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रवाद का ही नतीजा है कि पूंजीपति हाकिमों की मदद से संसाधनों की खुली लूट कर रहे हैं।
फिल्म महोत्सव में आज
सुबह 10 बजे : ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ व ‘महक मिर्जा’ का प्रदर्शन
दोपहर एक बजे : दस्तावेजी फिल्म ‘कास्ट ऑन मेनू कार्ड’ का प्रदर्शन
दोपहर 1.30 बजे : कश्मीरी फिल्म ‘खून दियो बराव’ का प्रदर्शन
दोपहर तीन बजे : उड़िया कहानी ‘जनमत’ पर बनी फिल्म का प्रदर्शन
शाम 5.30 बजे : दस्तावेजी फिल्म ‘मोड़’ का प्रदर्शन
शाम सात बजे : ‘साहिर लुधियानवी की याद में’ डॉ. अजीज का गीतमय संबोधन