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चार तहसील पर दस एसडीएम, 16 ब्लाक के लिए 4 बीडीओ

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गोंडा। जिले के अहम विभागों में अफसरों कमी खल रही है। चार तहसीलों के लिए दस एसडीएम की तैनाती है। जिसमें 6 अतिरिक्त एसडीएम के रूप में कार्यरत हैं, कई को ब्लाक का बीडीओ बना रखा गया है। 16 ब्लॉकों के लिए सिर्फ चार बीडीओ तैनात है। मनरेगा का कार्य संचालित करने में दिक्कत आ रही है। इतना ही नहीं विकास महकमे के अहम पदों पर तैनाती ही नहीं है। परियोजना निदेशक और उपायुक्त मनरेगा के पद रिक्त हैं। इसी तरह फरवरी माह से बीएसए की भी तैनाती नही हो पाई है। यही नहीं 1214 पंचायतों में सचिवों की तैनाती में दिक्कत आ रही है।
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पंचायत चुनाव के बाद विकास कार्यों को मजबूती से लागू करना चुनौती भरा है। पंचायत स्तर पर कर्मियों की कमी तो है ही, ब्लाक व जिला स्तर पर भी अधिकारियों की कमी खल रही है। परियोजना निदेशक के पद पर एक अधिकारी की नियुक्ति हुई थी, उन्होंने अपना संशोधन करा लिया। उपायुक्त मनरेगा पर नियुक्त अधिकारी आने से कतरा रहे हैं। बीएसए का पद भी फरवरी से ही खाली है। यहां 15 जुलाई को बाराबंकी जिले के डायट में तैनात वरिष्ठ प्रवक्ता दीपिका चतुर्वेदी की नियुक्ति हुई है, लेकिन वह नहीं आईं। उन्होंने मेडिकल ले लिया है। वहीं 16 ब्लॉकों के लिए सिर्फ चार खंड विकास अधिकारी की तैनाती है। विकास की अहम जिम्मेदारी बीडीओ की ही होती है। 1214 पंचायतों में सचिवों की तैनाती में दिक्कत आ रही है। दो सौ से कम सचिव जिले में है। एक सचिव के जिम्मे आठ पंचायतों का भार है। इससे विकास के कार्य ढर्रे पर नही आ पा रहा है। अधिकारियों को कार्य कराने में पसीने छूट रहे हैं। वहीं पंचायत सचिवों की मनमानी भी बढ़ रही है।
जिले का माहौल रोक रहा अफसरों के कदम
- शासन स्तर पर जिले का माहौल ठीक नहीं है। ऐसा संदेश है कि यहां पर सियासी दबाव ऐसा है कि मनमाफिक काम न करने पर कार्रवाई करा दी जाती है। जिले के बड़े अफसर कठपुतली की तरह नजर आते हैं। यही माहौल अफसरों के कदम जिले में आने से रोक रहे हैं। यह अलग बात है कि जिले में आने के बाद अफसर जाना नहीं चाहते हैं। अधिकारियों और सियासतदानों के खांचे में फिट बैठने के बाद जिले में बने रहने की जुगत लगाते रहते हैं। फिलहाल तो आधा दर्जन अफसर या तो आए नही है या फिर अपने आदेश को संशोधित करा लिए हैं। इसकी खासी चर्चा है।
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लगातार कार्रवाइयों से खराब हुआ माहौल
- जिले के बेसिक शिक्षा विभाग में तो लगातार कार्रवाइयों से माहौल खराब हुआ है। साल 2015 में बीएसए डा. फतेह बहादुर सिंह को छोड़ दें तो कोई भी आराम से लंबी देकर जिले से नही जा सका। उनके बाद आए शिवेंद्र सिंह भी कम दिनों में ही हटा दिए गए। इसके बाद अजय सिंह आए और निलंबित हुए। उनके स्थान पर आए संतोष कुमार देव पांडेय को भी सियासी प्रतिस्पर्धा में हटवा दिया गया। इसके बाद रमाकांत वर्मा कम समय ही रह सके। मनिराम सिंह तो उस मामले में निलंबित हो गए, जिसमें उनकी कोई भूमिका ही नही थी। इसके बाद डा. इंद्रजीत प्रजापित भी निलंबित हुए। डायट प्राचार्य व सहायक शिक्षा निदेेेशक विनय मोहन वन ही प्रभार देख रहे हैं। 15 जुलाई को दीपिका चतुर्वेदी की तैनाती हुई, लेकिन विभाग में लगातार हुई कार्रवाईयों से आने से कतरा रही हैं। उन्हें यहां का माहौल रास नहीं आ रहा है।
- जिले में अधिकारियों की कमी से दिक्कत तो आ रही है। फिलहाल कार्यों को सुचारू ढंग से संचालित किया जा रहा है। जिलाधिकारी ने शासन को रिपोर्ट भेजकर अधिकारियों की तैनाती किए जाने की संस्तुति की है। उम्मीद है कि जल्द ही अफसरों की तैनाती हो। - शशांक त्रिपाठी, मुख्य विकास अधिकारी
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