गोंडा। ट्रैक्टर खरीद में हुए 95 लाख रुपये के गबन के मामले में शनिवार को श्रावस्ती जिले की क्राइम ब्रांच टीम ने धानेपुर थाने पहुंचकर एजेंसी संचालक व सेल्स मैनेजर समेत 52 किसानों के बयान दर्ज किए। क्राइम ब्रांच इंस्पेक्टर विमलेंद्र कुमार ने सभी से अलग अलग पूछताछ की और खरीद फरोख्त के पूरी प्रक्रिया की जानकारी हासिल की। ट्रैक्टर खरीदने वाले किसान भी अपना बयान दर्ज कराने के लिए दिनभर थाने पर डटे रहे।
कोतवाली नगर क्षेत्र के बहराइच रोड पर संचालित एक ट्रैक्टर एजेंसी के संचालक हारून ने एक वर्ष पहले धानेपुर थाने में अपने ही फील्ड आफिसर समेत दो लोगों के खिलाफ जालसाजी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी और आरोप लगाया था कि उसकी एजेंसी पर फील्ड आफिसर व एक अन्य कर्मचारी ने वित्तीय वर्ष 2017 सो 2020 तक 134 ट्रैक्टरों की बिक्री की थी।
आरोप है कि इस दौरान उन्होंने किसानों से मिले पैसे को एजेंसी पर जमा नहीं किया और दोनों ने मिलकर करीब 35 लाख रुपये का गबन कर लिया। इस मामले की विवेचना श्रावस्ती जिले की क्राइम ब्रांच कर रही है। मामले की जांच के लिए शनिवार को क्राइम ब्रांच को इंस्पेक्टर विमलेंद्र कुमार धानेपुर थाने पहुंचे और इस मामले में जुड़े सभी पक्षों के बयान दर्ज किए।
निरीक्षक विमलेंद्र ने एजेंसी संचालक, फील्ड आफिसर व ट्रैक्टर खरीदने वाले किसानों से अलग अलग पूछताछ की और फिर सभी का आमना सामना भी कराया। निरीक्षक विमलेंद्र कुमार ने बताया कि इस पूरे मामले की गहनता से पड़ताल की जा रही है और जो भी दोषी पाए जाएंगे उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
एजेंसी संचालक हारून की माने तो तीन वर्षों में उसने 134 किसानों से डाउन पेमेंट लेकर उन्हें ट्रैक्टर बेचा था। बाकी की गई धनराशि किसानों को किश्त के तौर पर अदा करनी थी। धनराशि बकाया होने के चलते ट्रैक्टर किसानों को वाहन के कागजात नहीं दिए गए।
वहीं बकाया वसूली के लिए हारुन ने फील्ड कर्मचारियों को तैनात कर रखा था। अधिकतर किसानों का कहना है कि वह समय समय पर किश्त की धनराशि फील्ड कर्मचारियों को भुगतान करते रहे। जब बकाया पूरा हुआ तो वह अपने वाहन का कागजात लेने पहुंचे।
वहां पता चला कि उन्होंने बकाया धनराशि जमा ही नहीं की है। इसका खुलासा होने पर एजेंसी संचालक ने अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ धानेपुर थाने में केस दर्ज करा दिया लेकिन किसानों के कागजात नहीं दिए। इसका खामियाजा ट्रैक्टर खरीदने वाले किसानों को भुगतना पड़ रहा है। अब किसान अपना कागजात पाने के लिए एजेंसी से लेकर थाने तक का चक्कर लगा रहे हैं।
पुलिस तफ्तीश में यह जानकारी भी सामने आई है कि तीन वर्षों में जिन ट्रैक्टरों को डाउन पेमेंट लेकर बेंचा गया उनका रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराया गया। नियमों के मुताबिक एजेंसी से वाहन को तभी डिलीवर करने का नियम है जब उसका रजिस्ट्रेशन हो चुका हो। जांच अधिकारी विमलेंद्र कुमार ने भी उसकी पुष्टि की कि डिलीवरी के पहले वाहनों का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए था।
जबकि एजेंसी संचालक हारुन का कहना है कि ट्रैक्टर बेचने पर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाता। जब पूरा भुगतान मिल जाता है तब रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि आखिर किन परिस्थितियों में बगैर रजिस्ट्रेशन के वाहनों की डिलीवरी कराई गई। अब बगैर रजिस्ट्रेशन के सड़कों पर दौड़ रहे इन ट्रैक्टरों से यदि कोई हादसा होता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।