फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

महाभारत काल के मंदिर तक जाने के लिए बांस- बल्ली का सहारा

विज्ञापन
गोंडा में इटियाथोक के परसियागूदर गांव में स्थित चितेश्वरनाथ मंदिर जाने के लिए बांस का सहारा लेत? - फोटो : GONDA
विज्ञापन
गोंडा। इंटियाथोक के परसिया गूदर के चितैया जोत गांव में महाभारत काल में बने एतिहासिक चितेश्वर नाथ मंदिर तक जाने के लिए लोगों को जान जोखिम में डालना पड़ता है। मंदिर के पास निकले नहर पर पुल न होने से वर्षों से लोगों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है। हर साल उन्हें भरोसा मिलता है कि पुल बन जाएगा लेकिन फिर उन्हें नहर पर बांस और बल्लियों से पुल तैयार करके ही मंदिर आना पड़ता है। पुल के निर्माण का प्रस्ताव दिए जाने का दावा तो क्षेत्रीय विधायक विनय द्विवेदी करते हैं लेकिन अभी लोगों को लकड़ी से पुल बनाकर ही आना जाना पड़ता है।
विज्ञापन

माना जाता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान यहां पर वीर अर्जुन ने एक शिवलिंग स्थापित किया था। बाद में यहां पर गांव के लोगों ने मंदिर बनाया। तबसे इस मंदिर की अलग ही मान्यता है और महाशिवरात्रि, मलमास, कजली तीज पर्व पर जनपद के कोने-कोने से श्रद्धालु जलाभिषेक करने आते हैं। 20 वर्षों से श्रद्धालु बांस बल्लियों के सहारे नहर पार जलाभिषेक करते हैं। मंदिर जाने वाले मुख्य मार्ग पर करीब 20 वर्ष पूर्व सरयू नहर विभाग द्वारा नहर की खुदाई कर दी गई। इस मार्ग पर आवागमन के लिए पुल का निर्माण नहीं कराया गया। ग्रामीण बताते हैं कि यह मार्ग सीधे चितेश्वर नाथ मंदिर होते हुए मनवर नदी के उद्गगम स्थल को जोड़ता था। यहां के लोगों ने कई बार शासन प्रशासन से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों सांसद विधायक से पुल निर्माण की मांग करते चले आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार सांसद व विधायक यहां पर पुल निर्माण के लिए प्रस्ताव नहर विभाग को भेज चुके हैं। पुल का निर्माण नहीं हुआ। जब हम लोग शासन-प्रशासन से निराश हो गए तो खुद चंदा लगाकर बांस बल्लियों का पुल बनाया अब कई दर्जन गांव के ग्रामीण प्रतिदिन इन्हीं बांस बल्लियों के सहारे मंदिर तक पहुंच कर जलाभिषेक करते हैं ।
अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने स्थापित किया था शिवलिंग
गांव में स्थित चितेश्वर नाथ महादेव मंदिर की स्थापना महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने की थी। मंदिर के पुजारी महंत गोली दास ने बताया कि करीब 200 वर्ष पूर्व वीर अर्जुन के द्वारा स्थापित यह शिवलिंग खेत में एक टीले पर दिखाई पड़ा था। पड़ोसी गांव के भटपुरवा की दयाशंकर ने इस विराटतम शिवलिंग को खोदकर अपने घर ले जाने की कोशिश की और शिवलिंग को ले जाने के लिए खुदाई शुरू की। लेकिन वह खुदाई नहीं कर सके। पुजारी का कहना है कि अनंत गहराइयों तक वह पहुंच नहीं सके। इससे उसने जमीन के नीचे से शिवलिंग को काटने लगे और वह मानसिक संतुलन खो बैठे। इसके बाद उनके परिजनों ने वहां पर पूजा-अर्चना कर ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कराया। कुछ समय में मंदिर बनकर तैयार हो गया। तब से यह मंदिर स्थापित है। सैकड़ों वर्ष पूर्व संत घिराऊ दास महाराज ने अयोध्या के सरयू से जल भर कर जमीन पर लेट-लेट कर यहां पहुंचकर जलाभिषेक किया था। शुरुआती दौर में चिंताहरण के नाम से इस शिव मंदिर को जाना जाता था। बाद में चितैया जोत गांव में होने के कारण मंदिर का नाम चितेश्वर नाथ महादेव मंदिर हो गया।
विज्ञापन

चितेश्वरनाथ मंदिर तक जाने के लिए नहर होने से दिक्कत आ रही है। जानकारी में है और प्रस्ताव भी दिया गया है। जल्द ही पुल निर्माण कराया जाएगा। प्रयास किया जा रहा है। -विनय कुमार द्विवेदी, विधायक मेहनौन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें