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बेस लाइन सर्वे की खामियों से डेढ़ लाख गरीब अभी कच्चे घर में

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गोंडा के लालपुर गांव में टिनशेड में रहता गरीब परिवार। - फोटो : GONDA
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गोंडा। हर गरीब को आशियाना दिलाने की मंशा पर आला अफसरों की लापरवाही भारी पड़ रही है। इसके चलते जरूरतमंद गरीबों को जहां सिर छिपाने को छत नहीं मिली वहीं अपात्र परिवारों को कई आवास आवंटित हो गए। यह खामी 2011 के उस बेसलाइन सर्वे के कारण हुई जिसमें गरीबों के साथ तमाम अमीरों को शामिल कर दिया गया और वास्तविक गरीब आवास तो दूर पात्रता सूची में भी जगह नहीं बना पाए।
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वर्ष 2002 में बीपीएल सूची बनाई गई थी जिसमें जिले के 2.11 लाख परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को शामिल किया गया था। पहले इस सूची के आधार पर इंदिरा आवास आवंटित हुए थे।
वर्ष 2011 में सामाजिक आर्थिक गणना करायी गई इसमें भी गरीब शामिल नहीं हो पाए। इस सर्वे में फिर अधिकांश उन्हीं परिवारों को शामिल किया जो बीपीएल सूूची में शामिल थे। इस सूची के आधार पर वर्ष 2017 में ही बजट रोक दिया गया कि अब जिले में कोई गरीब नहीं बचा है जिसे आवास दिया जाए।
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वर्ष 2018 में तत्कालीन सीडीओ आईएएस दिव्या मित्तल ने पुन: सर्वे कराया। इस सर्वे में उन्होंने सीधे पात्रों से ही आवेदन मांगे। इसमें विकास भवन में 1.46 लाख लोगों के आवेदन प्राप्त हुए। वास्तविक पात्रों की इस बड़ी भीड़ को देखकर कर प्रशासन के अधिकारी भी सकते में आ गए।
छानबीन में सामने आया कि वास्तविक गरीबों को सामाजिक आर्थिक गणना में जानबूझ कर शामिल नहीं किया गया था। इस सूची को सीडीओ ने प्रदेश व केंद्र सरकार को भेज दिया।
शासन की ओर से सभी की जियो टैगिंग व सत्यापन कराकर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया। प्रशासन ने एक लाख लोगों की जियो टैगिंग करायी लेकिन 46 हजार लोगों की जियो टैगिंग अभी तक नहीं हो पायी है। पात्रों की श्रेणी में होने के बावजूद करीब डेढ़ लाख गरीब बदहाल पड़े कच्चे मकानों में रहने को मजबूर बने हैं।
विकास खंड कटरा के चुर्रामुर्रा ग्राम पंचायत के राजस्व ग्राम गौरवाजानी पुर निवासी भूमिहीन व आवासहीन कुसुम देवी पत्नी राम पाल दूबे ने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ लेने के लिए प्रधान सहित अधिकारियों के कई बार चक्कर काट चुके हैं।
लेकिन अभी तक सुनवाई नहीं हुई, जिससे अपने पन्द्रह वर्षीय बेटे शिवा व पत्नी के साथ मजबूरन छप्पर में अपनी जीविका चला रहे है। ग्रामसभा शाहजोत चाइनपुरवा में गरीबी का दंश झेल रही ऊषा अपने पांच मासूम बच्चों के साथ भुखमरी व खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं।
ऊषा ने बताया कि 27 फरवरी को उनके पति कमलेश की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। पति के मृत्यु के बाद पांच बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई है। भूमिहीन होने के बाद भी वह किसी तरह मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार को चलाती है।
गरीबों को आवास दिए जाने की प्रकिया पात्रता सूची के आधार पर शुरू हुई हसमत अली, रहमत अली, दोस्त मोहम्मद, मुमताज ने बताया कि आवास की पात्रता सूची में उनका नाम होने पर भी प्रधान व ग्राम पंचायत अधिकारी ने मिली भगत करके अपात्र घोषित कर दिया। जिससे हमें आवास नहीं मिल सका।
बेस लाइन सर्वे में खामियों की वजह से जिले में 1.20 लाख परिवार को छोड़ दिया गया। इस सर्वे में भी प्रधानों के दखल के कारण शौचालय नहीं बन पाए और जिला ओडीएफ नहीं हो सका। इन खामियों को अब दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रधानों की दखल के कारण पात्रों को किसी भी योजना में शामिल होने का मौका नहीं मिल पा रहा है।
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