अयोध्या। विवादित ढांचा विध्वंस की बरसी छह दिसंबर को लेकर रामनगरी में चौकसी बढ़ा दी गई है। हालांकि अब इस तिथि को लेकर न तो कहीं शौर्य व विजय का उत्साह है और न ही विध्वंस का गम।
अयोध्या अतीत की बातें भूलकर तरक्की के नए आयाम स्थापित करने के लिए कदमताल करती दिख रही है। संवाद सिर्फ सौहार्द का है, अयोध्या उत्सव में लीन है तो अयोध्यावासी तरक्की के सपने बुन रहे हैं।
छह दिसंबर 1992 की तिथि करीब आते ही रामनगरी की सीमाएं सील हो जाती थीं। सुरक्षाकर्मियों के बूटों की आवाज व वाहनों के सायरन से लोग अनहोनी की आशंका से सिहर उठते थे।
वह छह दिसंबर 1992 का ही दिन था जब लाखों कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचा ढहा दिया था, तभी से यह तिथि दोनों समुदायों के लिए तल्खी का सबब बन गई थी।
नौ नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट से राममंदिर के हक में निर्णय आने के पूर्व छह दिसंबर की तिथि पर मुस्लिम जहां कारोबार बंद रख, दुकानों पर काला झंडा लगाकर यौम-ए-गम मनाते थे।
विश्व हिंदू परिषद सहित अन्य हिंदू संगठनों की ओर से शौर्य व विजय दिवस का आयोजन होता था। अब दौर बदला है, तस्वीर बदली है, मंजर भी बदला है। अब न तो कहीं कोई तल्खी है और न ही शौर्य का इजहार।
जब से राममंदिर के हक में निर्णय आया है, रामनगरी नई उड़ान की ओर तेेेजी से अग्रसर है। हिंदू-मुस्लिम सभी एक साथ मिलकर अयोध्या की तरक्की के लिए पूरी शिद्दत से कदमताल करते दिखते हैं।
इसकी पुष्टि छह दिसंबर से एक दिन पहले शनिवार को अयोध्या के उत्सवी माहौल को देखकर हुआ। सरयू अपनी रौ में बह रही थी, घाटों पर जयकारे गूंज रहे थे तो हनुमानगढ़ी में रामनाम, हनुमंतलला के उद्घोष की धूम रही।
श्रीराम जन्मभूमि दर्शनमार्ग पर भक्तों की लंबी कतार भी अयोध्या के पुरातन वैभव के उत्कर्ष का इशारा कर रही थी। कारसेवकपुरम में प्रख्यात संत मोरारी बापू की कथा सुनने के लिए हजारों की संख्या में भक्त आनंद में डूब थे।
दिल्ली से करीब एक हजार यात्रियों को लेकर ट्रेन भी आई थी। ये यात्री भी अयोध्या की धार्मिकता में लीन दिख रहे थे। मुस्लिम इलाकों में भी बेफिक्री का माहौल रहा, लोग सिर्फ सौहार्द की बात करते दिखे।
विवादित ढांचा के पक्षकार रहे हाजी महबूब भी अब पुरानी बातों को भूलना ही बेहतर बताते हैं। हाजी छह दिसंबर के दिन पूरा विरोध दर्ज कराते थे, घर पर सभा होती थी लेकिन इस बार ऐसी कोई तैयारी नहीं है।
कहते हैं कि ढांचा विध्वंस की बरसी अब अतीत की बात हो गई है। न्यायपालिका ने जो फैसला दिया था हमने उसे स्वीकार किया है, पूरा देश इससे वाकिफ है। केवल कुरानख्वानी व फातिहा पढ़कर शहीदों की आत्मा की शांति के लिए दुआ मांगेंगे।
इकबाल अंसारी के पिता हाशिम अंसारी व स्वयं इकबाल अंसारी ने वर्षों तक विवादित ढांचे के मुकदमे की पैरवी की है। इकबाल अब इन सभी विषयों को भूल चुके हैं। कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कर दिया है।
मुस्लिम फैसले को मान चुके हैं। अयोध्या सहित पूरे हिंदुस्तान में सुकून है। मुसलमानों की तरफ से कहीं कोई काला दिवस नहीं मनाया जाएगा। अब विवाद की बात की जरूरत नहीं है, केवल विकास व रोजगार की बात हो रही है।
विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं कि छह दिसंबर को किसी तरह के आयोजन की तैयारी नहीं है। श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य राममंदिर का निर्माण ही हमारे लिए शौर्य दिवस है। सदियों के संकल्प की सिद्धि हो रही है।
विश्व हिंदू परिषद ने पिछले वर्ष भी छह दिसंबर पर अपनी पूरी जिम्मेदारी का परिचय देते हुए कोई आयोजन नहीं किया था। इस वर्ष भी ऐसा कुछ नहीं है। केवल त्रेतायुग की अयोध्या सजाने पर ही ध्यान होना चाहिए।