अयोध्या। आजादी के बाद पहली बार किसी राष्ट्रपति का सपत्नीक अयोध्या आकर रामजन्मभूमि में शीश झुकाना.. करोड़ों रामभक्तों के लिए बेहद भावपूर्ण क्षण था। पीताबंरी और भगवा ध्वज से सजी-धजी रामनगरी में राष्ट्रपति के स्वागत के लिए लोग उमड़ पड़े। पिछले साल ठीक इसी ममाह की पांच तारीख को राममंदिर का भूमिपूजन करके पहला सुखद अनुभव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया था, लेकिन कोरोना के चलते अयोध्यावासी उनसे रू-ब-रू नहीं हो पाए।
अबकि बार यह कसक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उनकी धर्मपत्नी सविता कोविंद ने दोपहर 11:35 बजे विशेष प्रेसिडेंसियल ट्रेन से उतरते ही राम-राम करते हुए आमजन के बीच आकर पूरी कर दी। वे रामायण कॉन्क्लेव का शुभारंभ करने के बाद अयोध्या में महाराज के रूप प्रतिष्ठित हनुमान जी का दर्शन पूजन करने हनुमानगढ़ी गए, फिर श्रीरामजन्मभूमि जाकर अस्थाई मंमदिर में विराजमान रामलला का चारों भाईयों के साथ दर्शन-पूजन और सपत्निक आरती उतारी, फिर राममंदिर निर्माण देखने गर्भगृह भी गए।
पूरे यात्रा में वे यहां आकर खुद को धन्य समझ रहे थे। साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से विश्व की सबसे सुंदर पर्यटन नगरी बनाने के अभियान के लिए बधाई भी दी। रामायण कान्क्लेव के शुभारंभ के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रामचरित मानस की पंक्तियों के जरिए रामकथा के महत्व का वर्णन किया। कहा रामकथा सुंदर करतारी, संसय विहग उड़ावन हारी...मतलब राम की कथा हाथ की वह मधुर ताली है तो संदेह रूपी पक्षियों को उड़ा देेती है।
राष्ट्रपति ने कहा कि अयोध्या अपराजेय है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जिसके साथ युद्ध करना असंभव हो। रघु, दिलीप, अज, दशरथ और राम जैसै रघुवंशी राजाओं ने पराक्रम व शक्ति के कारण उनकी इस राजधानी को अपराजेय माना जाता था। रामायण कॉन्क्लेव के आयोजन और कला व संस्कृति के माध्यम से आम लोगों तक रामायण पहुंचाने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ और उनकी टीम की सराहना भी की।
उन्होंने कहा रामायण का प्रचार महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें जीवन के निहित मूल्य मानवता के लिए हमेशा प्रासंगिक हैं। दर्शन के साथ-साथ रामायण आदर्श आचार संहिता भी प्रदान करती है जो हमारे जीवन के सभी पहलुओं का मार्गदर्शन करती है। रामचरित मानस में एक आदर्श व्यक्ति व एक आदर्श समाज दोनों का सामूहिक वर्णन मिलता है।
रामराज्य में आर्थिक सम़ृद्धि के साथ आचरण की शुद्धता का वर्णन मिलता है। रामचरित मानस में कहा गया है कि नहिं दरिद्र कोऊ दुखी न दीना..। अयोध्या की जनभाषा में रचित रामचरित मानस एक जनांदोलन बन गया था। रामचरित मानस की पंक्तियां लोगों में आशा जगाती हैं, प्रेरणा का संचार करती हैं और ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं।
काधर मन कहुं एक आधारा, दैउ दैैउ आलसी पुकारा..,ऐसी सूक्तियों के सहारे लोेग अपना मार्ग बनाते चलते हैं। हमें युवा पीढ़ी को रामकथा में निहित जीवन मूल्यों से जोड़ना है। महर्षि बाल्मीकि ने रामकथा को अपने काव्य में जीवंत रूप दिया है। रामायण में स्वंय राम निवास करते हैं। महर्षि बाल्मीकि ने कहा कि जब तक पृथ्वी पर पर्वत व निदयां विद्यमान रहेंगे तब तक रामकथा लोकप्रिय रहेगी।
रामकथा की लोकप्रियता विश्वव्यापी है। तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरित मानस की रचना कर रामकथा को जन-जन से जोड़ दिया। विश्व के अनेक देेशों में रामकथा की प्रस्तुति रामलीला के द्वारा की जाती है। उत्तरभारत, दक्षिण व पूर्व में रामकथा के अनेक ग्रंथ प्रचलित हैं। इंडोनेशिया, मालदीव, नेपाल, कंबोडिया, सूरीनाम आदि में प्रवासी भारतीयों ने रामकथा को जीवंत बनाया है।
रामकथा प्रेमी प्रवासियों भारतीयों ने मॉरीशस में रामायण सेंटर की स्थापना की है। रामकथा का साहित्यिक, आध्यात्मिक प्रभाव मानवता के बहुत बड़े भाग में देखा जा जाता है। अनेक भाषाओं, लोक संस्कृति में रामायण का प्रभाव दिखता है। राष्ट्रपति ने तमाम देशों का जिक्र करते हुए कहा कि अयोध्या व रामायण अनेक देशों से हमारे संबंधों को सांस्कृतिक शक्ति प्रदान करते हैं।
दक्षिण कोरिया और नेपाल के जनकपुर का भी अयोध्या से गहरा रिश्ता है। दक्षिण पूर्व एशिया में रामायण व भारतीय संस्क़ति का प्रभाव दिखाई देता है। अनेक विदानों ने मध्य व उत्तरपूर्व एशिया सहित विश्व के अनेक देशों में रामायण से जुड़ी कलाकृतियों, शिलालेख आदि का जिक्र किया है। इसी वर्ष दिल्ली में थाई राजकुमारी द्वारा थाई रामायण राम किएन का विमोचन किया गया।
राष्ट्रपति ने कहा कि रामायण में रामभक्त शबरी के प्रसंग से हम सभी परिचित हैं। शबरी प्रसंग सामाजिक समरसता का अद्भुत संदेश देता है। महान तपस्वी मतंग मुनि की शिष्या शबरी व राम का मिलन एक भेदभाव मुक्त समाज व प्रेम की दिव्यता का अद्भुत उदाहरण है। निषादराज के साथ प्रभु राम का गले मिलना समरसता, सौहार्द और प्रेम की उत्कृष्टता का अनुभव कराता है।
वनवास के दौरान प्रभु राम ने युद्ध करने के लिए अयोध्या और मिथिला से सेना नहीं मंगवाई। उन्होंने कोल, भील, वानर आदि को एकत्रित कर सेना का निर्माण किया, अपने अभियान में जटायू और गिलहरी तक को शामिल किया। आदिवाशियों के साथ प्रेम और मैत्री को प्रगाढ़ बनाया। प्रभु राम द्वारा ऐसे समावेशी समाज की रचना व एकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जो हम सबके लिए आज भी अनुकरणीय है।
राष्ट्रपति ने कता कि मैं तो समझता हूं कि मेरे माता-पिता और बुजुर्गों ने मेरा जब मेरा नामकरण किया होगा तो उन सब में भी संभवत: रामकथा और प्रभुराम के प्रति वही श्रद्धा और अनुराग का भाव रहा होगा, जो सामान्य लोकमानस में देखा जाता है। महात्मा गांधी ने भी प्रभु राम के जीवन को आत्मसात किया था। बापू जी की दिनचर्या में रामनाम का बहुत ही महत्व था।
गाधी जी द्वारा दिल्ली में मानस हरिजन कथा का आयोजन किया गया था मैं उसमें शामिल रहा। मैं आशा करता हूूं कि अयोध्या भविष्य में मानव सेवा का एक उत्कृष्ट केंद्र बनेगी। सामाजिक समरसता का उदाहरण प्रस्तुत करेगी। नैतिक व आध्यात्मिक संस्कारों के लिए प्रसिद्ध होगी। शिक्षा व शोध का प्रमुख वैश्विक केंद्र बनेगी। रामकथा के आदर्शां का सर्वत्र प्रचार प्रसार हो तभी रामायण कॉन्क्लेव की सार्थकता होगी।
राष्ट्रपति ने कहा कि रामायण कॉन्क्लेव की सार्थकता सिद्ध करने हेतु यह आवश्यक है कि राम-कथा के मूल आदर्शों का सर्वत्र प्रचार-प्रसार हो और सभी लोग उन आदर्शों को अपने आचरण में ढालें। समस्त मानवता एक ही ईश्वर की संतान है। यह भावना जन-जन में व्याप्त हो। यही इस आयोजन की सफलता की कसौटी है।
इस संदर्भ में रामचरित मानस की एक लोकप्रिय चौपाई का उल्लेख करते हुए कहा कि सिय राममय सब जग जानी,करउँ प्रनाम जोरि जुग बानी..। इस पंक्ति का भाव यह है कि हम पूरे संसार को ईश्वरमय जानकर सभी को सादर स्वीकार करें. हम सब, प्रत्येक व्यक्ति में सीता और राम को ही देखें। राम सबके हैं, और राम सब में हैं।
हम सब इस स्नेहपूर्ण विचार के साथ अपने दायित्वों का पालन करें। राष्ट्रपति ने कोविड महामारी का जिक्र करते हुए इससे मुक्ति की भी कामना की। कहा कि कोविड महामारी के प्रकोप का सामना करती हुई मानवता के लिए हमारी परंपरा में प्रचलित यह प्रार्थना और भी प्रासंगिक हो गई है। सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:ख-भाग् भवेत...मैं कामना करता हूं कि जिस प्रकार रामराज्य में सभी लोग दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्त थे। उसी प्रकार हमारे सभी देशवासी सुखमय जीवन व्यतीत करेंगे।