चकरनगर। देश में आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। आजादी के इतिहास में अग्रणी भूमिका निभाने वाले चंबल घाटी के राजा निरंजन सिंह चौहान ने जंग-ए-आजादी में देश के लिए राजपाट तक कुर्बान कर दिया, लेकिन सरकारों ने खंडहर में तब्दील हो चुके राजमहल और राज परिवार की ओर ध्यान नहीं दिया।
तहसील मुख्यालय चकरनगर से पश्चिम दिशा में 500 मीटर की दूरी पर बीहड़ की ओर स्थित राजा निरंजन सिंह के परिजन खंडहर महल के सामने रहते हैं। आजादी का गवाह महल का जीर्णशीर्ण मुख्यद्वार उपेक्षा की कहानी कहता नजर आता है।
राजा के पारिवारिक लोग महल के खंडहर हो जाने के बाद महल के ही आसपास अपने आशियाने बनाकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। कुछ लोग महल को छोड़कर अन्य जगहों पर जाकर बस गए।
महल के निकट ही प्राचीन हनुमान मंदिर है। राज परिवार के समय का ही कुआं भी सदियों सूखा पड़ा हुआ है। पीढ़ी दर पीढ़ी राज परिवार के लोग और राजा का चुनाव करते हैं।
राजा के परिवार के लोगों को राजघराना की इज्जत ग्रामीणों ने दी जाती है। वर्तमान राजा विजय प्रताप सिंह जूदेव चकरनगर स्टेट राजा के रूप में सुशोभित है।
1857 में चकरनगर रियासत के राजा कुशलपाल सिंह चौहान थे। आजादी की जंग का शंखनाद होते ही राजा कुशलपाल सिंह और उनके तरुण ने दोआब क्षेत्र को आजादी की लड़ाई की अग्रिम चौकी में बदल दिया।
उनके साथ अंग्रेज फौज के बाग़ी सिपाही अपनी सैनिक वर्दियों और बंदूकों समेत आजादी की जंग में कूद पड़े। राजा कुशलपाल सिंह जनता में बहुत ज्यादा लोकप्रिय थे। उनके पुत्र निरंजन सिंह युद्धकला में बहुत दक्ष थे।
उनका अपना कन्हैया घोड़ा, सहयोद्धा मंगली मेहतर और जंगली मेहतर प्राणों से अधिक प्रिय थे। आजादी की जंग में दोआब क्षेत्र के बाग़ी सिपाहियों, किसानों और जनता के सभी समुदायों के नेतृत्व को स्वीकार किया।
निरंजन सिंह की वीरता और सैन्य शक्ति की कीर्ति चारों ओर दोआब के उस पार भिंड जिले के कुशवाह धार तक फैल गई थी।
ब्रिटिश फौजों ने की थी दाखिल होने की कोशिश
ब्रिटिश शासकों ने एक बड़ी फौज को लेकर जुहीखा घाट पर बर्बर हमला कर दिया। दोआब इलाके में दाखिल होने की कोशिश की। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व स्वयं इटावा का कलेक्टर एओ ह्यूम कर रहा था।
इस युद्ध में दोआब के रणबांकुरों के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या में कुशवाह धार के संग्रामी योद्धाओं ने वीर योद्धा चिमना जी के नेतृत्व में हिस्सा लिया। दोनों पक्षों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए।
अंग्रेज दोआब इलाके में दाख़िल नहीं हो सके। मई 1857 से प्रारंभ स्वतंत्रता संग्राम को 1858 के अंत तक दो वर्षों से अधिक समय तक निरंजन सिंह ने न केवल युद्ध जारी रखा ,बल्कि किसी नदी घाट से अंग्रेजी फौजों को इलाके में दाख़िल नहीं होने दिया।
विश्वासघात कर बनाए गए थे बंदी
29 मई 1861 में राजा निरंजन सिंह को जयपुर के विश्वासघाती नरेश के इशारे पर पालिटिकल एजेंट ने बंदी बना लिया। साम-दाम-दंड भेद की नीति पर अमल कर बड़ी संख्या में विद्रोहियों को गिरफ्तार कर उनकी हत्याएं कर दीं थीं। इस कार्य में सहयोग करने वालों को जागीरें व इनाम मिले थे।
स्वतंत्रता सेनानी को ही भूल गई सरकार
चकरनगर स्टेट के वर्तमान वारिस विजय प्रताप सिंह चौहान कहते हैं हमारे परदादा राजा निरंजन सिंह ने देश की आजादी के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया था। आजाद देश की सरकारों ने आज तक हमारे परिवार की तरफ मुड़ कर भी नहीं देखा।
हमारे परदादा के नाम को ही सरकार भूल गई जो अब केवल इतिहास के पन्नों में ही दर्ज हो कर रह गया है। अनदेखी से राजमहल खंडहर हो गया है।