इटावा। विधानसभा चुनाव की नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब चुनावी चौसर पूरी तरह से तैयार है। सभी राजनीतिक दल अपना अपना दांव अपने अपने हिसाब से खेल रहे हैं। कुल मिलाकर चुनाव का पूरा परिदृश्य जातीय ध्रुवीकरण पर आकर टिक जाता है। चुनाव में मुद्दों की बात कम जाति का गणित ज्यादा लगाया जा रहा है।
इटावा विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो यहां कभी सवर्ण तो कभी पिछड़ी जाति के प्रतिनिधि विधायक निर्वाचित होते रहे हैं। इस क्षेत्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोधी राजपूत और शाक्य कुशवाहा वर्ग के मतदाता बहुतायत में है। यही कारण है कि राजनीतिक दल कोई भी रहा हो टिकट इन्हीं वर्ग के नेताओं के इर्द गिर्द घूमता रहा है। भाजपा की पसंद सवर्ण और सपा की पसंद पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने सवर्ण कार्ड खेलते हुए वैश्य वर्ग के कुलदीप गुप्ता संटू को मैदान में उतारा था। पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में हुए बिखराव का लाभ भाजपा को मिला और भाजपा की सरिता भदौरिया चुनाव जीतीं।
इस बार सपा ने सर्वेश शाक्य, भाजपा ने सरिता भदौरिया, बसपा ने कुलदीप गुप्ता संटू, कांग्रेस ने राशिद खान को प्रत्याशी बनाया है। राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से इस बार लोधी और ब्राह्मण वर्ग के किसी प्रतिनिधि को टिकट नहीं दिया है। इसलिए हार व जीत का सारा दारोमदार अब इसी वर्ग के मतदाताओं पर आकर टिक गया है। भाजपा, सपा और बसपा के बीच इन वर्ग से जुड़े मतदाताओं को अपने पाले में खींचने की जोर आजमाइस चल रही है। भाजपा ने हाल ही में सपा नेता व पूर्व ब्लाक प्रमुख शिवप्रताप राजपूत को अपने पाले में खींच लिया। अब सपा और बसपा भी अंदर ही अंदर भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे हैं। वर्ष 1977 से अब तक 12 विधानसभा चुनावों में छह बार ब्राह्मण, तीन बार क्षत्रिय और तीन बार पिछड़े वर्ग के लोधी राजपूत या शाक्य वर्ग से ही विधायक निर्वाचित हुए हैं।