बकेवर/चकरनगर। चुनाव की फिजा में चंबल के कुख्यात डाकुओं के फरमानों की गूंज अब बीते हुए कल की बात हो चुकी है। एक जमाने में चुनावी मुुकाबले का परिणाम काफी कुछ डकैतों के फरमान के आधार पर ही तय होता था।
अब चंबल की वादियों में न डकैत हैं और न फरमान। यमुना-चंबल घाटी के बीहड़ी क्षेत्र में डेढ़ दशक पूर्व डकैतों के फरमान प्रत्याशियों की हार-जीत तय करने वाले होते थे।
भले ही डकैतों के फरमान आज नहीं हैं, फिर भी लोकतंत्र का जब-जब महापर्व आता है, फरमानों को याद करके बीहड़ी के लोगों की रूह आज भी कांप जाती है।
विधानसभा का यह संभवतया चौथा चुनाव होगा, जब यमुना चंबल घाटी के नाम के मशहूर इस क्षेत्र के आम मतदाता स्वतंत्र मतदान कर प्रदेश की महापंचायत के लिए अपना विधायक चुनेंगे।
करीब डेढ़ दशक से चंबल में न तो कोई डाकू है, न ही उनका कोई गैंग। दरअसल वर्ष 1990 से पहले लेकर वर्ष 2005, 06 तक डकैतों के आतंक के बीच जीने को मजबूर रहे हैं। यहां के लोगों के लिए अब मतदान में डकैतों के फरमान का खौफ नहीं है।
ग्राम पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा चुनावों तक यहां खूंखार डाकुओं के फरमान पर मतदाता वोट डालने को विवश हुआ करते थे। बीहड़ी क्षेत्र का इलाका इस बात का गवाह है कि जिसने भी बीहड़ के दस्यु सरगनाओं की नाफरमानी की उसे परिणाम भुगतना पड़ा।
एक दौर था, जब बीहड़ और बीहड़ी गांवों की पगडंडियां और रास्ते डकैतों गैंगों की चहलकदमी से थर्राते थे और अक्सर गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजते रहते थे।
दस्यु सम्राट के नाम से मशहूर निर्भय गुर्जर, श्रीराम, लालाराम, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, रामआसरे उर्फ फक्कड़, कुसमा नाइन, सलीम उर्फ पहलवान गुर्जर, रज्जन गूर्जर, जगजीवन परिहार, गंभीर सिंह, चंदन यादव, ऐसे नाम हैं, जो बीहड़ी में वर्षों तक आतंक का पर्याय बने रहे।
इस दौर में बीहड़ी मतदान केंद्रों पर बैलेट पर हमेशा बुलेट हावी होता था।
90 के दशक से हुई फरमान की शुुरुआत
डकैतों के फरमान की शुरुआत यमुना और चंबल घाटी में जातीय आधार पर पंचायत चुनाव में 1990 से शुरू हुई। उसके बाद इसका प्रभाव बढ़ कर विधानसभा, लोकसभा के चुनाव तक आ पहुंचा।
1996 मे लखना विधानसभा सीट (अब भरथना) से चुनाव में डाकू रज्जन गुर्जर आदि डकैतों ने फरमान पहली बार जारी किया। जिसका प्रभावी असर देखने को मिला कि उस दल के प्रत्याशी की जीत हुई।
1998 के लोकसभा चुनाव में कुख्यात डाकू रामआसरे उर्फ फक्कड़ ने फरमान जारी किया, जिसका चंबल इलाके के हर मतदान केंद्र पर इसका असर दिखा। बाद में फक्कड़ ने अपने गैंग के करीब नौ साथियों के साथ साल 2004 में मध्यप्रदेश के भिंड में समर्पण कर दिया था।
फूलन ने रिश्तेदार के लिए मांगा था समर्थन
वर्ष 1990 के दशक में बिठौली ग्राम सभा के प्रधान का चुनाव आया, तो फूलन देवी ने अपने नजदीकी रिश्तेदार के लिए केवल वोट मांगने के साथ साथ उनके फरमान पर जीत भी हासिल की।
1991 में हुए विधानसभा चुनाव में दस्यु रामआसरे फक्कड़ ने जिस राजनीतिक दल के समर्थन में प्रचार किया। उसे क्षेत्र की दोनों सीटें मिल गईं। इतना ही नहीं चुनावी रंजिश ने बीहड़ी रंजिश को भी जन्म दिया।
दस्यु लालाराम और फक्कड़ के बीच टकराव हुआ। ये दोनों बड़े गिरोह जब आपस में टकराए तो चंबल की वादियों में तमाम नए दस्यु गिरोहों का जन्म हो गया।
सलीम गुर्जर ने बहन को बनवाया था प्रधान
क्वारी नदी की गोद में बसे विंडवा कला गांव में दस्यु सलीम गुर्जर ने अपनी बहन को 1995 में प्रधान बनवाया था। 2000 में अपने बहनोई को प्रधान का ताज पहनवाया।
2005 के चुनाव में जगजीवन परिहार ने चौरेला से अपने परिवारी को चुनाव जितवाया तो, कुंवरपुरा, बिडोरी, नींवरी करियावली, क़ुर्छा, हनुमंतपुरा सहित दर्जनों पंचायतों में दस्यु निर्भय गुर्जर के लोग चुनाव जीत गए।
फरमान के बाद किसी ने नहीं भरा था पर्चा
कुंवरपरू, कुर्छा में डकैतों के फरमान का असर ये हुआ कि किसी ने पर्चा ही नहीं भरा। एक साल बाद प्रशासन ने बड़ी मशक्कत से चुनाव करवाया तो जीते हुए प्रधान को गांव छोड़कर इटावा शहर में रहना पड़ा।
इतना ही नहीं क्षेत्र पंचायत सदस्य चुने गए एक जन प्रतिनिधि की तो निर्भय गुर्जर ने गांव आकर उसकी नाक काट ली थी, क्योंकि उसने चुनाव लड़ा और गांव में स्कूल के लिए जमीन दी थी।