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दोपहर भोजन पर भी महंगाई की मार

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इटावा। बच्चों के मिड-डे मील पर महंगाई का दंश भोजन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। लगातार बढ़ती खाद्य पदार्थों और गैस सिलिंडर की कीमतों के कारण शासन से निर्धारित राशि कम पड़ती जा रही है।
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कन्वर्जन कास्ट बढ़ाने को लेकर शिक्षक संगठन लगातार मांग करते आ रहे हैं। जनपद के एक लाख से अधिक बच्चों को स्कूलों में दोपहर भोजन योजना में मिलने वाले मिड-डे मील पर महंगाई की मार पड़ रही है।
प्राथमिक विद्यालयों में पांच रुपये से कम और उच्च प्राथमिक में आठ रुपये से कम में प्रति बच्चे की दर से भोजन की गुणवत्ता को बनाए रखना शिक्षकों के लिए चुनौती बन रहा है। ऐसे समय में जब महंगाई दर आसमान छू रही है।
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एक अप्रैल 2020 से प्राइमरी स्कूलों में 4.97 रुपये और मिडिल स्कूलों में 7.45 रुपये प्रति बच्चे की दर से कन्वर्जन का भुगतान किया जा रहा है। महंगाई का आलम यह है कि जो अरहर की दाल पहले 80 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रही थी, वह अब 120 रु पये पहुंच गई है।
सरसों का तेल 100 रुपये से बढ़कर दोगुने दाम पर 220 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। सब्जियों में आलू 20 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। टमाटर 80 रुपये की दर से बिक रहा है। इसी तरह मसालों के दाम भी काफी बढ़ चुके हैं।
600 रुपये में मिलने वाला गैस सिलिंडर आज 940 रुपये में मिल रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस महंगाई में स्कूलों के हेडमास्टर बच्चों को गुणवत्तायुक्त भोजन कैसे परोसें।
कई जिलों में जहां एनजीओ मिड-डे मील का काम देखते है, उनको अन्य संस्थाओं से दान भी मिल जाता है। प्रधानाध्यापकों को इसी लागत में भोजन तैयार कराना होता है। उसमें भी 60 से 75 प्रतिशत बच्चों की उपस्थिति पर ही विभाग भुगतान करता है।
यह भुगतान भी कई माह बाद किया जाता है। लागत बढ़ाने को लेकर शिक्षक संगठन लगातार मांग भी करते आ रहे, लेकिन अभी तक इस तरफ शासन का ध्यान नहीं गया है।
बढ़ती हुई महंगाई में दोपहर भोजन तैयार कराना शिक्षकों के लिए चुनौती बना हुआ है। इस धनराशि के बावजूद गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाता है।
विसंगति के बाद भी शिक्षक बच्चों को मिड-डे मील गुणवत्तापूर्ण बनवा रहे हैं। शिक्षक संगठन के माध्यम से कन्वर्जन कास्ट बढ़ाने की मांग की जा रही है।
-गौरव गुप्ता, ताखा ब्लाक अध्यक्ष, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ
महंगाई के सापेक्ष में कन्र्वर्जन कास्ट कम है। सरकार को इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे गुणवत्ता से युक्त भोजन बच्चों को मिलता रहे।
- तिलक सिंह, अध्यक्ष जनहित कल्याण समिति
कन्वर्जन कास्ट के संबंध में शासन स्तर से निर्णय लिया जाएगा। मिड-डे मील की गुणवत्ता से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। सभी विद्यालयों में मीनू के आधार पर भोजन तैयार किया जा रहा है।
-उमानाथ, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी
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कन्वर्जन कास्ट के नाम पर पांच रुपये की राशि अपने आप में हास्यास्पद है। सरकार को इस बारे में शीघ्र निर्णय लेना चाहिए।
- नरेंद्र गुप्ता, जिलाध्यक्ष, किसान संगठन
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पांच साल में तीन रुपये बढ़ी कास्ट
पिछले वर्षों में कन्वर्जन कास्ट की लागत पर नजर डालें तो 2015 में प्राथमिक स्कूलों में यह दर रुपये 3.59 वहीं 2016 में 3.86 और 2017 में 4.13, 2018 में 4.35, 2019 में 4.48 और 2020 में 4.97 प्रति बच्चा रही है, जबकि उच्च प्राथमिक में 2015 में 5.38 से 2020 में बढ़कर 7.45 प्रति बच्चा की दर से निर्धारित है।
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रसोइयों को छह माह से नहीं मिला मानदेय
ऊसराहार। स्कूलों में दोपहर भोजन योजना पकाने वाली 3 हजार से अधिक रसोइयों को 6 महीने से मानदेय नहीं मिल पाया, जिससे उनकी दिवाली भी फीकी रहने की उम्मीद है। रसोइयों ने मानदेय दिलवाने की मांग की है। जिले के स्कूलों में बच्चों को दोपहर भोजन योजना में परोसे जाने वाले भोजन को पकाने की जिम्मेदारी उठाने वाली महिला रसोइयों को मार्च 2021 से अभी तक मानदेय नहीं मिल सका है। इनमें से अधिकांश रसोइया गरीब परिवारों से आती है। छह माह से मानदेय न मिलने से मुफलिसी में जीवन गुजारना पड़ रहा है। (संवाद)
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