बकेवर। कोरोना और लॉकडाउन ने लोगों के जीवन की दिशा बदल दी है। बड़े शहरों में रहकर रोजी-रोटी कमाने वाले लोग अब यहीं रहकर अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं।
लाकडाउन में घर वापसी करने वाले लोग अब शहर लौटने के लिए तैयार नहीं है। उनका कहना है कि किसी भी तरह से यहीं पर अपना रोजगार जमा लिया है, अब घर छोड़कर नहीं जाएंगे।
बकेवर क्षेत्र के बेरीखेड़ा गांव निवासी जसविंदर राठौर ने बताया कि वह उत्तराखंड में पनीर की फैक्टरी में काम करते थे। 12 हजार रुपये वेतन मिल जाता था। लाकडाउन में घर आ गए।
दोबारा गए तो नौकरी नहीं मिली। अब किसी तरह से जुगाड़ करके ई-रिक्शा खरीद लिया है। तीन महीने से वही चला रहे हैं। प्रतिदिन औसतन 500 रुपये की आमदनी हो जाती है।
बताया कि अब वह नौकरी करने नहीं जाएगा। यहां पर आमदनी का जरिया बन गया है, साथ में अपनी खेतीबाड़ी भी देख रहे हैं। लखना के मुन्ना सिंह सेंगर पिछले 35 साल से दिल्ली में नौकरी-ठेकेदारी कर रहे थे।
बताया कि प्रतिदिन सात सौ रुपये की आमदनी होती थी। लॉकडाउन में दिल्ली छोड़ना पड़ा। दोबारा गए तो वहां पर काम बहुत कम हो गया। आमदनी भी घट गई।
दोबारा फिर लॉकडाउन हो गया। इसके बाद सब्जी का खुदरा कारोबार शुरू कर दिया। चकरनगर तहसील के पथर्रा गांव के मुन्ना लखना में निवास कर रहे हैं। सब्जी के काम में प्रतिदिन 500 रुपये की आमदनी हो जाती है।
इसके अलावा पत्नी भी समूह के माध्यम से कमा लेती है। बेटा बीएड कर रहा है। बेटियां 11वीं और 12वीं की पढ़ाई कर रहीं हैं। परिवार साथ में है और आमदनी भी दिल्ली के बराबर है, इसलिए घर छोड़कर जाने का कोई औचित्य नहीं।
क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों ने लॉकडाउन के दौरान घर वापसी की। बाद में उन्होंने यहीं रोजी-रोटी का ठिकाना बना लिया। लाकडाउन खुलने के बाद भी बड़े शहरों की ओर रुख नहीं किया। पशुपालन, ई-रिक्शा, सब्जी के कारोबार को बहुत लोगों ने अपनी रोजी-रोटी का जरिया बनाया।
तीन गुना बढ़ी आटो-ई रिक्शा की संख्या
लाकडाउन के बाद बकेवर में ऑटो और ई-रिक्शा की संख्या काफी बढ़ गई है। ऑटो मैजिक एसोसिएशन के ठेकेदार डेविड शर्मा व भूरे खान कहते हैं कि इस समय बकेवर में ऑटो की संख्या बहुत बढ़ गई है।
दो साल पहले की अपेक्षा तीन गुना के करीब हो गई है।
बकेवर व आसपास क्षेत्र के रहने वाले युवा जो कोरोना से पहले दिल्ली, मुंबई, गुजरात या अन्य कही बाहर रोजगार या मजदूरी करते थे, लॉकडाउन में आने के बाद उनका रोजगार टूट गए, ऐसी स्थिति में युवाओं ने किसी तरह जुगाड़ कर ऑटो खरीदे और चला रहे हैं।
इस समय बकेवर में डेढ़ सैकड़ा के करीब ऑटो हैं।