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नहाय खाय के साथ आज से छठ पूजा

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इटावा। देशभर में छठ पूजा त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान आशुतोष शिव की कृपा से यह त्योहार सूर्यदेव को समर्पित है। दिवाली के बाद से ही बाजार में छठ पूजा की रौनक दिखने लगती है।
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छठ पूजा पर्व दिवाली के छह दिन बाद मनाया जाता है। छठ महापर्व 8 नवंबर से शुरू होकर 11 नवंबर तक चलेगा। चार दिन चलने वाले छठ महापर्व से जुड़ी हर जानकारी, पूजा की तिथियां, शुभ मुहूर्त, सूर्योदय और सूर्यास्त का समय, प्रसाद और साथ ही व्रत कथा इस प्रकार से है-
पहला दिन : नहाय खाय
ज्योतिषाचार्य राजीव अग्रवाल ने बताया कि इस पर्व में भगवान सूर्य की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। छठ पूजा के पहले दिन की शुरुआत नहाय खाय के साथ होती है। नहाय खाय आठ नवंबर को है।
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इस दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 42 मिनट पर और सूर्यास्त शाम को 5 बजकर 27 मिनट पर होगा। व्रतधारी स्नान करके नए कपड़े धारण करते हैं और शाकाहारी भोजन करते हैं। इनके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।
दूसरा दिन : खरना
छठ पूजा के दूसरे दिन को खरना कहते हैं। इस दिन छठ करने वाला श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखकर शाम के वक्त खीर और रोटी बनाते हैं। खरना 9 नवंबर को मनाया जाएगा।
शाम को रोटी और गुड़ की खीर का प्रसाद बनाया जाता है, जिसमें चावल, दूध के पकवान, ठेकुआ भी बनाया जाता है और फल सब्जियों से पूजा की जाती है। इस दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 40 मिनट पर और सूर्यास्त शाम को 5 बजकर 40 मिनट पर होगा।
तीसरा दिन : अस्त होते सूर्य को अर्घ्य
छठ महापर्व के तीसरे दिन शाम को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस बार शाम को अर्घ्य 10 नवंबर को दिया जाएगा। छठ व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं और शाम को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
इस दिन पवित्र नदी या तालाब में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है, जिसका इंतजाम कई घाटों पर किया जाता है। कई बार लोग अपने घर के सामने स्थित पार्क में भी गड्ढे में जल भरकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा निभाते हैं।
चौथा दिन: उगते हुए सूर्य को अर्घ्य
छठ महापर्व के चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य देने के बाद लोग घाट पर बैठकर विधिवत तरीके से पूजा करते हैं, फिर आसपास के लोगों को प्रसाद दिया जाता है। इस बार उगते हुए सूर्य को अर्घ्य 11 नवंबर को दिया जाएगा।
छठ पूजा तिथि और मुहूर्त
सोमवार 8 नवंबर को छठ पूजा के दिन सूर्योदय, सुबह 6 बजकर 42 मिनट पर, छठ पूजा के दिन सूर्यास्त, शाम को 5 बजकर 40 मिनट पर। छठ महापर्व के दिन छठी मइया को ठेकुआ, मालपुआ, खीर, सूजी का हलवा, चावल के लड्डू, खजूर आदि का भोग लगाना शुभ माना जाता है।
छठ पूजा की व्रत कथा
एक राजा था जिसका नाम स्वायम्भुव मनु था, उनका एक पुत्र प्रियवंद था। प्रियवंद को कोई संतान नहीं हुई और इसी कारण वो दुखी रहा करते थे, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी को प्रसाद दिया, जिसके प्रभाव से रानी का गर्भ तो ठहर गया, लेकिन मरा हुआ पुत्र पैदा हुआ।
राजा प्रियवंद उस मरे हुए पुत्र को लेकर श्मशान गए। पुत्र वियोग में प्रियवंद ने भी प्राण त्यागने का प्रयास किया। ठीक उसी समय मणि के समान विमान पर षष्ठी देवी आ पहुंची। राजा ने उन्हें देखकर अपने मृत पुत्र को जमीन में रख दिया और माता से हाथ जोड़कर पूछा कि हे सुव्रते! आप कौन हैं।
तब देवी ने कहा कि मैं षष्ठी माता हूं। इतना कहते ही देवी षष्ठी ने उस बालक को उठा लिया और खेल-खेल में उस बालक को जीवित कर दिया, जिसके बाद माता ने कहा कि तुम मेरी पूजा करो, मैं प्रसन्न होकर तुम्हारे पुत्र की आयु लंबी करूंगी और साथ ही वो यश को प्राप्त करेगा।
इस घटना के बाद राजा ने घर जाकर बड़े उत्साह से नियमानुसार षष्ठी देवी की पूजा की, जिस दिन यह घटना हुई और राजा ने जो पूजा की उस दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि थी, जिसके कारण तब से षष्ठी देवी यानी की छठ देवी का व्रत का शुरू हुआ।
यमुना नदी के किनारे होती छठ पूजा
सैफई स्थित नगला सुभान प्राथमिक विद्यालय की सहायक अध्यापिका ऋचा राय ने बताया कि छठ महापर्व की पूजा वह शहर में यमुना नदी के किनारे घाट पर करने जाती हैं। इस दौरान कई महिलाएं भी शामिल रहती हैं।
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पालिका के सफाई एवं खाद्य निरीक्षक आनंद कुमार ने बताया कि दिवाली से पूर्व ही साथ ही मुख्यमंत्री के शहर आगमन को लेकर साफ सफाई करवा चुकी थी।
छठ पूजा की महत्ता को देखते हुए यमुना तट के आस पास फिर से साफ सफाई करवा दी गई, जिससे पूजा पाठ करने आने वाले लोगों को परेशानियों का सामना न करना पड़े।
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