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पार्क में दबंगों का कब्जा, सड़क पर लगता मेला

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ताखा। आजादी के लिए नगला ढकाऊ में तीन वीर सपूतों ने अंग्रेजों की गोली खाई थी। इनकी स्मृति में बनाए गए पार्क पर दबंगों ने कब्जा जमाया हुआ है। इनकी याद में हर साल होली के बाद सप्तमी को मेला लगता है।
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शहीदों की स्मृति में लगाया जाने वाला ये मेला सड़क पर लगता है। इस मेले की आजादी के बाद भी कोई सुध लेने को तैयार नहीं है। ताखा विकासखंड में नगला ढकाऊ में शहीदों के पार्क व मेले के लिए आरक्षित जमीन पर दबंग कब्जा किए हुए हैं।
हर वर्ष होली की सप्तमी से तीन दिन शहीद मेला सड़क पर लगता रहा है। 1931 में महात्मा गांधी ने लगानबंदी का आंदोलन छेड़ा था। आंदोलन में हिस्सा लेने वाले गांव के गोपालदास सिंह को अंग्रेजी हुकूमत ने जेल भेज दिया था।
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वर्षों बाद जिस दिन गोपालदास जेल से छूटे तो जनता के लिए वह खुशी का पल था। गोपालदास का स्वागत करने के लिए आसपास के गांव सुतियानी, नगला बले, मामन हिम्मतपुर, नगरिया यादवान, नगला दुली समेत कई गांव से लोग इकट्ठे हुए और इंकलाब जिंदाबाद वंदे मातरम् के नारे लगा रहे थे।
उसी समय अंग्रेज सिपाही मौके पर पहुंचे नारा लगाने से मना किया। लोग नहीं माने और नारे लगाते रहे। इस पर अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियां चला दी। जिसमें नगला ढकाऊ के शंकर सिंह यादव, नगरिया यादवान के बलवंत सिंह यादव और मामन हिम्मतपुर के भूपाल सिंह शाक्य शहीद हो गए।
बुजुर्गों के अनुसार, महात्मा गांधी ने तीनों शहीदों के शव को दिल्ली मंगवाया और वहीं पर उन्हें समाधि दे दी गई। आजादी के बाद वर्ष 1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शहीदों को श्रद्धांजलि देने नगला ढकाऊ आए थे।
उस समय उन्होंने शहीदों की याद में मेले व पार्क के लिए एक हेक्टेयर जमीन दी थी। कई बार प्रधानों ने जमीन के लिए स्वीकृत दी, लेकिन प्रशासन ने अभी तक जमीन को आरक्षित कर अभिलेखों में दर्ज नहीं की।
वर्ष 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शहीद स्तंभ को नगला ढकाऊ भेजा, जिसे गांव में तत्कालीन डीएम द्वारा लगवाया गया।
शहीद शंकर सिंह यादव के नाती राम नरेश यादव ने बताया कि कमिश्नर से लेकर डीएम तक ने कई बार शहीद पार्क व मेले की जमीन को आरक्षित कर अभिलेखों में दर्ज करने के आदेश जारी किए, लेकिन तहसील प्रशासन ने मेले व पार्क की जमीन को आरक्षित नहीं किया और न अभिलेखों में दर्ज किया।
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