एटा। दशलक्षण पर्व के नौवें दिन सोमवार को श्रावक-श्राविकाओं ने उत्तम आंकिचन धर्म की पूजा-अर्चना की। पुरानी बस्ती स्थित बड़े जैन मंदिर में विशुद्धमती माता के सानिध्य में भक्तों ने जिनेंद्र प्रभु का भक्तिभाव से पूजन किया।
छम, छम, छम छमाछम बाजे घुघरूं, हाथों में दीपक लेकर आरती करूं, पंखिड़ा ओ पंखिड़ा, आया दशलक्षण पर्व महान भजन की गूंज जैसे ही मंदिर परिसर में हुई तो पीतवस्त्रधारी इंद्र बने श्रावक प्रभु भक्ति के साथ झुमे। भक्तों ने जयकारे लगाते हुए जमकर प्रभु भजनों पर नृत्य किया। माताजी ने श्रावकों को बताया कि आत्मा के सिवाय कुछ भी अपना न लगना उत्तम आंकिचन धर्म है। यह हमें सिखाता है कि चाहे हम लोगों के बीच में रहें या न रहें, लेकिन उनके प्रति हमारे मन में पराये का भाव न हो। हम सबको सहज भाव से ग्रहण करें।
जैन महिला संगठन की अध्यक्षा बबिता जैन प्रेरणा ने बताया कि आत्म कल्याण के महापर्व पर्यूषण में भक्त आस्था से सराबोर हैं। सोमवार को जानकीदास चैत्यालय से सामग्री यात्रा निकाली गई। शाम को बड़े जैन मंदिर में आरती के बाद भव सागर से पार प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। योगेश जैन, पंकज जैन, दिनेश चुक्खा, सुधीर धारी, महेंद्र जैन, तरुण जैन, बंटी पॉपूलर, प्रदुम्न जैन आदि लोग मौजूद रहे।
अंदर-बाहर से त्याग करना ही आकिंचन
अवागढ़ के बड़े जैन मंदिर में पंडित विकास जैन शास्त्री, अनिकेत भैया ने बताया कि आकिंचन मतलब खाली हो जाना। खाली होने से अभिप्राय है कि अंदर बाहर सभी ओर से त्याग करना। अगर त्याग कर दिया और मन से अपना-अपना नहीं गया तो सब बेकार है। दोपहर में श्री तत्तवार्थ सूत्र का वाचन हुआ। सांय काल में धार्मिक अंत्याक्षरी में बच्चों ने बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया। दीपक जैन, बसंत जैन, अंकित जैन, बासु जैन, परमिल जैन सेठी, अशोक जैन आदि मौजूद रहे।