एटा। पानी के बताशों की खेती इस बार किसानों के जीवन में मिठास घोलेगी। जलेसर और अवागढ़ क्षेत्र में बड़े स्तर पर सिंघाड़े का उत्पादन होता है। इसे स्थानीय भाषा में पानी के बताशे भी कहा जाता है। इस बार अच्छी बारिश होने से तालाबों, नालों में पानी भर गया है, जो सिंघाड़े की खेती लिए मुफीद है। ऐसे में किसानों को कमाई बढ़ने की उम्मीद है।
जलेसर और अवागढ़ विकास खंड क्षेत्रों में बारिश होने के बाद सिंघाड़ों की खेती करने वाले किसानों ने तालाबों और गड्ढों में भरे पानी में बेल डालकर खेती की तैयारी शुरू कर दी है। गांव नूंहखेड़ा, खेरिया सुर्जी, नगला चांद, खेड़िया रसीदपुर, अब्दुलहईपुर, पिलखतरा, मकसूदपुर, नगला केसरी, मीसां खुर्द, मीसा कलां, मंडनपुर, कुसवा, बलीदादपुर, नगला झंडू, नरहुली, बलेसरा आदि गांवों में पारंपरिक खेती से हटकर सिंघाड़े की खेती पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
सितंबर तक सिंघाड़े का उत्पादन हो जाएगा। किसानों का कहना है कि उत्पादन अच्छा होने के साथ ही यदि बाजार में सही दाम मिला तो किसानों का लाभ होगा।
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यहां तक पहुंचती है सिंघाड़े की मिठास
जिले के सिंघाड़े की दिल्ली, जयपुर, जोधपुर, अजमेर आदि बडे़ शहरों के अलावा, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात आदि राज्यों में भी मांग है। विभिन्न मंडियों से इसकी आपूर्ति पहुंचाई जाती है।
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डेढ़ गुना बढ़ा रकबा
समय पर पानी की कमी के चलते पिछले तीने वर्षों में सिंघाड़े की खेती में काफी गिरावट आई है। हालांकि इस बार अच्छी बारिश से किसान खुश हैं। पिछले वर्ष की अपेक्षा डेढ़ गुना रकबा बढ़ गया है। करीब दस हजार बीघा में खेती की जा रही है। एक बीघा में करीब 15 क्विंटल सिंघाड़ा पैदा होता है।
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बोले किसान
खारजा नहर के अलावा नूहं टेल सप्लाई चैनल, जिनावली और पुन्हैरा रजबहा में पर्याप्त पानी न मिलने से पिछले वर्षों में सिंघाड़े की अच्छी खेती नहीं हो सकी। इस बार रिकॉर्ड बरसात से उम्मीदें बढ़ी हैं।
- जसवीर सिंह, नूंहखास
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कीटनाशक, फफूंद नाशक दवाओं आदि को मिलाकर एक बीघा खेती में करीब आठ हजार रुपये की लागत आती है। इसका बीज बिजनौर, संबल, अलीगढ़ आदि जनपदों से लाकर उसकी बेल बनाते हैं।
उदयवीर सिंह, खेरिया सुर्जी