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मेडिकल कॉलेज के वार्डों में प्राइवेट लैब की जांच

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एटा। कहने को तो जिला अस्पताल और जिला महिला अस्पताल का अब मेडिकल कॉलेज में उच्चीकरण हो गया है। लेकिन व्यवस्थाएं अब भी नहीं सुधर रहीं हैं। बुखार के दौर में भी यहां सीबीसी और टायफाइड की जांच की सुविधा नहीं है। वार्डों में भर्ती मरीज व तीमारदार इन जांचों के लिए परेशान हैं। प्राइवेट पैथोलॉजी लैब के कर्मचारी आकर मरीजों के सैंपल ले रहे हैं। इस पूरी व्यवस्था को कॉलेज प्रशासन ने मूक सहमति दे रखी है।
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इन दिनों बुखार के मामले बहुत ज्यादा हैं। यूं तो सामान्य वायरल संक्रमण के मरीज सर्वाधिक हैं। लेकिन डेंगू, मलेरिया, टायफाइड का भी खतरा है। ऐसे में ये जांचें भी जरूरी हैं। मेडिकल कॉलेज की लैब में डेंगू और मलेरिया की जांच तो हो रही हैं, लेकिन किट की कमी के चलते टायफाइड की जांच नहीं हो पा रही।
वहीं डेंगू व अन्य बुखार पीड़ितों में प्लेटलेट्स काउंट पता करने के लिए की जाने वाली सीबीसी जांच भी मशीन खराब होने के कारण करीब दस दिन से बंद है। ओपीडी के मरीज तो यह जांच कराने के लिए निजी पैथोलॉजी लैब पर पहुंच रहे हैं। लेकिन वार्डों में भर्ती मरीजों के लिए है। इसका फायदा उठाते हुए प्राइवेट पैथॉलॉजी लैब वालों ने अपने कर्मचारी वार्डों में भेजना शुरू कर दिए हैं। जो मरीजों के सैंपल और रुपये लेकर जांच करा रहे हैं।
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केस 1: अनूप जौहरी की मां सत्यवती मैटरनिटी विंग में बने डेंगू वार्ड में भर्ती हैं। प्लेटलेट्स की जांच कराने को कहा गया। लेकिन अस्पताल में सुविधा नहीं थी। उन्होंने बताया कि बाहर किसी लैब से एक लड़का आया जो सीबीसी जांच कराने के लिए सैंपल और 500 रुपये ले गया।
केस 2: गांव लंभेटा के मरीज रामप्रताप को बताया गया कि सीबीसी मशीन खराब है, यह जांच कहीं बाहर से करानी होगी। कुछ ही देर बाद एक लड़का आया जो मरीजों के खून के सैंपल ले रहा था। पूछने पर बताया कि जांच कराकर यहीं रिपोर्ट दे दी जाएगी, तो सैंपल दे दिया।
मरीज और तीमारदार के अलावा किसी भी अनाधिकृत बाहरी व्यक्ति के अस्पताल में आने पर रोक लगाई गई है। नोटिस चस्पा किए गए हैं। दोनों सीएमएस की जिम्मेदारी है कि इसका पालन कराएं। यदि कोई अनाधिकृत बाहरी व्यक्ति पाया जाता है तो उसे पकड़वाकर एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
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डॉ. राजेश गुप्ता, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज
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