खालिद मुजाहिद के मामले में सरकार ने जो रुख अपनाया वह उसे दो तरफा लाभ पहुंचाने वाला साबित हो गया।
अव्वल तो अल्प संख्यकों की संतुष्टि के लिए जैसा पीड़ित पक्ष ने चाहा वैसा किया गया और दूसरा यह कि माया सरकार के चुनिंदा अफसरों को एक बार फिर हाशिए पर लगा दिया गया।
खालिद पर लगे आरोप सही थे या गलत इसका फैसला तो बाद में होगा, यह जरूर साबित हो जाएगा कि जिस तरह खालिद की गिरफ्तारी की गई वह गलत थी।
एसटीएफ के अधिकारियों ने जब खालिद और तारिक को उठाया, जहां से उठाया और जहां से जब पकड़ा जाना दिखाया, उसमें खासा अंतर है। यही अंतर निमेष आयोग की रिपोर्ट में सामने आया है।
इसी को आधार बनाकर खालिद व तारिक दोनों का मुकदमा समाप्त करने की कवायद हो रही थी।
अब जब सीबीआई की जांच होगी तो एक बार फिर एसटीएफ की यह चूक सामने होगी। इससे नामजद अधिकारियों के खिलाफ चलने वाले मुकदमे में उनके लिए दिक्कत ही पैदा होनी है।
दूसरी तरफ खालिद की मौत पर भड़के अल्प संख्यक समुदाय के लोगों ने जब इस मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने की मांग की तो सरकार ने बगैर किसी ना-नुकुर के उनकी बात मान ली और प्रकरण की जांच सीबीआई से कराए जाने की सिफारिश कर दी।
इसके फौरन बाद ही परिवारी जनों की मांग पर सरकार ने खालिद मुजाहिद की मौत के मामले में उसे गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करे जाने पर सहमति दे दी।
जो मुकदमा दर्ज हुआ उसमें तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी बृजलाल व एसटीएफ के अन्य अधिकारियों पर सीधा आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपनी गलती छिपाने के लिए खालिद की हत्या कराने की साजिश की।
खालिद के खिलाफ पुलिस और एसटीएफ द्वारा की गई फर्जी कार्रवाई को निमेष आयोग ने भी गलत ठहराया था और सरकार द्वारा उसके खिलाफ से मुकदमा हटाने की कवायद से परेशान होकर नामजद अधिकारियों ने साजिश कर खालिद मुजाहिद की हत्या करा दी।
मुकदमा दर्ज करने वालों ने इसके पीछे तर्क यह लिया की मुकदमा वापस होने वाला था, ऐसे में इन अफसरों की खासी किरकिरी होती। इसी वजह से इन सभी अफसरों ने साजिश रच कर खालिद मुजाहिद की हत्या करा दी।
मुकदमा दर्ज करने की अनुमति देने के साथ ही राज्य सरकार ने खालिद प्रकरण की जो जांच सीबीआई को संदर्भित की उसमें बाराबंकी में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपहरण, साजिश और हत्या के मुकदमे की जांच का मामला भी जोड़ा गया। सकार के इस कदम के बाद अब कोई पक्ष उस पर यह आरोप लगाने की स्थिति में नहीं है कि उसने कुछ जानबूझ कर किया या फिर किसी पक्ष की सुनवाई नहीं की।