300 करोड़ की बंदरबाट के बाद काश्तकार जमीन के मुआवजे के लिए भटक रहे हैं। अब तक 250 किसानों को मुआवजे का 20 करोड़ रुपये नहीं मिला है।
खास यह है कि कोर्ट ने माना है कि प्रशासन ने इस प्रोजेक्ट के तहत किसानों को दो-दो बार मुआवजा दिया गया। हालांकि प्रशासन का कहना है कि कब्जा लेने के लिए किसानों को व्यवस्था के तहत अनुग्रह राशि दी गई।
वित्त वर्ष-1990-91 में यूपीएसआईडीसी (उप्र. स्टेट इंडस्ट्रियल डवलपमेंट) ने अरनियां क्षेत्र के चार गांवों में 1204 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था।
यूपीएसआईडीसी को अधिग्रहण की गई कृषि भूमि पर औद्योगिक डवलपमेंट करना था। हालांकि किसानों के विरोध के चलते यूपीएसआईडीसी ने कृषि भूमि टीएसडीसी को बेच दी। टीएचडीसी को यहां 1360 मेगावाट क्षमता का थर्मल पावर प्लांट लगाना है।
खास यह है कि सरकारी महकमों के बीच जमीन की खरीद-बिक्री तो चलती रही, मगर अफसरों ने जमीन पर कब्जा लेना मुनासिब नहीं समझा। इसलिए किसानों को एक बार मुआवजा और दूसरी बार अनुगृह राशि दी गई।
हालांकि प्रशासन के अफसरों का मानना है कि उन्होंने व्यवस्था के तहत अनुगृह राशि दी। अफसर गंभीर होते तो किसानों से समय रहते कब्जा ले सकते थे। ऐसे में सरकारी खजाने
को 300 करोड़ रुपये की चपत लगने से बचाया जा सकता था।