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भाजपा प्रत्याशी जीत दोहराने की कोशिश में तो विपक्षी मुस्लिम और कैडर वोट साधकर मैदान मारने की होड़ में

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अमित सक्सेना / मुन्नालाल गुप्ता
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बदायूं। दातागंज विधानसभा क्षेत्र में इस बार रोमांचक मुकाबले के आसार हैं। दरअसल यहां भाजपा, सपा और बसपा के अलावा कांग्रेस भी मुकाबले में मानी जा रही है। किसान नेता से राजनीति में आए कांग्रेस प्रत्याशी ने आधे मुस्लिम वोट भी साध लिए तो सपा-बसपा की डगर मुश्किल हो सकती है जो भाजपा को पटखनी देने को आतुर हैं। हालांकि मुस्लिम वोटरों की खामोशी अभी नेताओं की धड़कन बढ़ा रही है।
दातागंज विधानसभा में शुरुआती दौर से अगड़े वर्ग के नेताओं और बाद में पिछड़ों की राजनीति चमकी है। जिले भर में जहां कांग्रेस हर चुनाव में सिसकती रही वहीं दातागंज में यह पार्टी लगातार पल्लवित हुई। इस बार किसान नेता आतिफ खां को कांग्रेस का टिकट मिला है। वह स्थानीय के नाते सभी वर्गों के वोटरों खासकर मुस्लिमों की गोलबंदी में जुटे हैं। उनकी मजबूती पर भाजपा की भी नजरें लगी हैं।
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भाजपा से मौजूदा विधायक राजीव कुमार सिंह को ही पार्टी ने दोबारा मौका दिया है। शुरू में सपा से शाक्य समाज के पूर्व विधायक सिनोद शाक्य को टिकट की बात चल रही थी पर टिकट कैप्टन अर्जुन प्रताप सिंह ने झटक लिया। इसे भाजपा ने फायदे के तौर पर लिया। भाजपा को अब मौर्य-शाक्य वोटरों के भी पूरे साथ की उम्मीद है और पार्टी यहां जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है।
इधर, सपा को अर्जुन के रूप में युवा चेहरे, यादव व मुस्लिम वोट के साथ कुछ अन्य वर्गों की मदद से जीत का आंकड़ा दिख रहा है। जिला पंचायत राजनीति की पैतृक विरासत के जुड़ाव का भी भरोसा सपा प्रत्याशी को है। सपा जिलाध्यक्ष के बेटे पूर्व ब्लॉक प्रमुख अवनीश यादव व सिनोद शाक्य को प्रबल दावेदारी के बाद भी सपा का टिकट नहीं मिला था। उन दोनों का इलाके में काफी असर है। उनके समर्थक चुनाव में सपा का साथ देंगे या नहीं, इसका भी अर्जुन के चुनाव पर असर पड़ेगा।
बसपा प्रत्याशी के रूप में युवा रचित गुप्ता लंबे समय से इलाके को मथ रहे हैं। सबसे पहले टिकट घोषित होने से अधिकतम जगह पहुंचकर वोटरों से जुड़ने का फायदा उन्हें मिल सकता है। बसपा के कैडर वोट के साथ ही उन्हें भी मुस्लिम व अन्य वर्गों पर भरोसा है। वह सजातीय होने की वजह से भाजपा के परंपरागत वैश्य वोट को भी अपना मानकर चल रहे हैं। इनके साथ ही आदमी पार्टी के धीरपाल कश्यप, विकासशील इंसान पार्टी के ओमवीर, राष्ट्रीय उदय पार्टी से मुन्नालाल, गरीब बेरोजगार विकास पार्टी से राजीव कुमार, जन अधिकार पार्टी से गणेश, बहुजन मुक्ति पार्टी से कृपाशंकर, राष्ट्रीय परिवर्तन दल से सुभाष चंद्र यादव, जनसेवा सहायक पार्टी से ब्रजपाल सिंह, भारतीय सुभाष सेना से रघुनंदन के साथ ही निर्दलीय राजीव पाल समेत कुल 14 दावेदार यहां जीत का दम भर रहे हैं। दावों वादों के साथ ही जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा, ये दस मार्च को पता लगेगा।
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मतदाता
कुल मतदाता- 404578
पुरुष मतदाता- 221115
महिला मतदाता- 186443
ट्रांसजेंडर- 30
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जातिगत मतदाता
मुस्लिम- 50000
यादव- 41000
ठाकुर- 52000
मौर्य-शाक्य- 40000
कश्यप- 38000
वैश्य- 25000
ब्राह्मण- 10000
साहू- 25000
दलित- 50000
भुर्जी- 10000
नाई- 8000
लोधे राजपूत- 25000
अन्य- 30578
(सभी आंकड़े लगभग में हैं)
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- प्रमुख मुद्दे
- तकनीकी शिक्षा
- आटा मिल
- राजकीय महाविद्याय
- स्टेडियम
- चीनी मिल
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कांग्रेस की राजनीति खूब चमकी और सवर्ण चेहरों की सियासत भी
रामगंगा की कटरी से जुड़े दातागंज विधानसभा क्षेत्र का मिजाज बाकी जिले की राजनीति से थोड़ा अलग हटकर है। यहां काग्रेस का काफी दबदबा रहा था। कांग्रेस के पंडित त्रिवेणी सहाय इलाके के दिग्गज नेता हुआ करते थे। विधायक रहते उनकी हत्या के बाद बेटी संतोष कुमारी पाठक ने राजनीतिक विरासत संभाली और चार बार विधायक रहीं। भाजपा के ठाकुर अवनीश कुमार सिंह पप्पू भइया ने अपने पिता पूर्व जज हरीश चंद्र सिंह के बाद चार बार विधानसभा पहुंचे। पिछले पांच चुनाव में सपा और बसपा दो-दो तो भाजपा एक बार जीत हासिल करने में सफल रही है।
आजादी के बाद 1952 में पहले चुनाव में प्रदेश में कांग्रेसी प्रचंड लहर में दातागंज से जनसंघ के उम्मीदवार ठाकुर ओंकार सिंह यहां से विजयी हुए थे। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी कानपुर निवासी उद्योगपति इंद्रजीत सिंह को हराया था। 1956 में परिसीमन के बाद दातागंज विधानसभा क्षेत्र बना। 1957 में पहला चुना हुआ था जहां कांग्रेस से सेवानिवृत्त जज बाबू हरीश चंद्र विधायक बने थे। 1962 में नारायण सिंह जनसंघ से विधायक चुने गए। 1968 में हरीश चंद्र सिंह फिर चुनाव जीते लेकिन निर्दलीय थे। 1969 में पंडित त्रिवेणी सहाय कांग्रेस से विधायक रहे। इसके बाद 1972 में उपचुनाव के दौरान संतोष कुमारी पाठक कांग्रेस से विधायक बनीं जो 1977 तक दो बार विधायक रहीं। 1977 में अवनीश कुमार पप्पू भइया जनता दल से विधायक चुने गए। 1980 में संतोष कुमारी पाठक का फिर से सितारा चमका और कांग्रेस से विधायक बनीं। 1985 में फिर अवनीश कुमार भाजपा से, 1989 में संतोष कुमारी पाठक कांग्रेस से, 1991 और 1993 में अवनीश कुमार सिंह भाजपा से विधायक बने। 1996 में इलाके की सियासत ने करवट ली और सपा के प्रेमपाल सिंह यादव जीत गए। अगले चुनाव में भी सपा के प्रेमपाल सिंह का ही जादू चला। 2007 फिर 2012 में बसपा के सिनोद शाक्य विधायक चुने गए। पिछले चुनाव में भाजपा के राजीव कुमार सिंह ने बसपा के सिनोद शाक्य को हरा दिया।
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व्यापारियो ने सुरक्षा पर दिए नंबर, आम वोटरों ने महंगाई पर घेरा
दातागंज विधानसभा का दायरा काफी लंबा चौड़ा है। दातागंज के साथ ही समरेर ब्लॉक, उसावां ब्लॉक, उसहैत व अलापुर जैसे बड़े कस्बे इस विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं। शाहजहांपुर व फर्रुखाबाद की गंगा कटरी से जुड़े सैकड़ों गांव भी यहां का विधायक चुनते हैं। हमने चुनावी पड़ताल की शुरुआत दातागंज कस्बे से ही की। यहां वैश्य वोटर बहुतायत में हैं। हलवाई यज्ञ प्रकाश से हमने बात की तो उनका कहना था कि दातागंज कस्बे में साफ सफाई से लेकर कई सहूलियत बढ़ी है। लोग महंगाई पर भाजपा को घेरते हैं पर हम व्यापारियों को सबसे बड़ा फायदा इस सरकार में सुरक्षा का मिला है। पहले सरेआम फायरिंग कर गुंडे चले जाते थे और व्यापारी से लेकर जनता तक खामोश रहते थे। भाजपा सरकार में इस समस्या से पूरी निजात मिली है। कस्बे के ही सप्पू यादव ने सपा की पूर्ववर्ती सरकार को बेहतर माना। कहा कि विकास के जितने काम सपा ने पूरे जिले में कराए उससे चौथाई भी भाजपा के जनप्रतिनिधि नहीं करा सके। बदलाव जरूरी है। महंगाई से आम जनता त्रस्त है, कोई सुनने वाला नहीं है। सहरा गांव के अनीस खां और नौनी टिकन्ना के धर्मवीर का कहना था कि सुविधाएं तो मिलीं पर घुमंतू पशुओं पर रोक का कोई इंतजाम सरकार ने नहीं किया। गोशालाएं खाली पड़ी हैं और पशु हमारी मेहनत की फसल उजाड़ रहे हैं। नौनी गांव की ही रुखसाना का कहना था कि सरकार कोई भी आए, रसोई गैस सिलिंडर सस्ता कर दे। बेरोजगारी बहुत है, लोगों को काम मिलेगा तो विकास अपने आप होने लगेगा। संवाद
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