बदायूं। राजकीय मेडिकल कॉलेज में चिकित्सकीय पढ़ाई कर रहीं छात्राओं में लगन के साथ कुछ बेहतर करने का जुनून है। वे नई सोच और नई तकनीक के साथ आगे बढ़ रहीं हैं। कुछ साल बाद पढ़ाई पूरी कर वे नई भूमिका में दिखेंगी। एमबीबीएस प्रथम व द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रहीं प्रशिक्षु चिकित्सकों से बात की तो इन्होंने बताया कि कोविड और महामारी से जुड़े नए अध्याय भी उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा बने हैं। कुछ ने देश में मौजूदा चिकित्सा पद्धिति तो कुछ ने ग्रामीण इलाकों में बीमारियों को लेकर जागरूकता के अभाव पर चर्चा की। कहा कि वह डॉक्टर बनने के बाद गरीब तबके के मरीजों पर ध्यान केंद्रित करेंगी और उन्हें बेहतर उपचार देने का काम करेंगी।
-
दिल्ली की ईशा ने लिया गरीबों की सेवा का संकल्प
दिल्ली निवासी ईशा शिरोमणि ने बताया कि वह बड़ी बहन से प्रेरणा लेकर चिकित्सा क्षेत्र में आई हैं। दीदी थर्ड ईयर की तो वह सेकेंड ईयर की स्टूडेंट हैं। बताया कि भविष्य में मौका मिला तो स्त्री रोग विशेषज्ञ बनना पसंद करेंगी। उन्हें पता है कि देहात क्षेत्र में महिलाओं व सामान्य रोगियों के इलाज में कई तरह की समस्याएं आती हैं। वह ऐसे ही क्षेत्रों में काम करके गरीबों की सेवा करना पसंद करेंगी। सरकारी सेवा में जाने का प्रयास करेंगी ताकि अलग-अलग क्षेत्र में रोगों की विविधता को समझकर उन्हें दूर कर सकें।
-
कुपोषित बच्चों को सेहतमंद करेंगी दिव्यांशी
-बरेली के कालीबाड़ी निवासी दिव्यांशी अग्रवाल का कहना था कि उनके मामा डॉ. नीरज अग्रवाल खटीमा में बाल रोग विशेषज्ञ हैं। उन्हीं की प्रेरणा से वह डॉक्टर बनने के लिए पढ़ाई कर रही हैं। दिव्यांशी का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों का कुपोषण बड़ी समस्या है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सक्रिय होने से ऐसे बच्चों को चिह्नित कर इलाज कराने में मदद मिली है। वह बाल रोग विशेषज्ञ बनीं तो बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करने का काम करेंगी। प्रयास करेंगी कि कस्बों व देहात क्षेत्र में भी काम कर सकें। गरीब मरीजों का खास ख्याल रखेंगी।
-
आकांक्षा की सोच, गांवों में बढ़े सहूलियत तो रुकेंगे डॉक्टर
चौपुला (बरेली) निवासी आकांक्षा मौर्य का कहना था कि उनका परिवार शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा है। उन्हें इस क्षेत्र में आना था तो तैयारी करके आ गईं। आकांक्षा ने स्वीकार किया कि कई सरकारी डॉक्टर गांवों के अस्पतालों में काम करना पसंद नहीं करते। इससे कई अस्पताल खंडहर तक हो जाते हैं। कहा कि इसमें ज्यादा कमी डॉक्टरों की बजाय सिस्टम की है। गांवों में आवास, बिजली, पानी व बच्चों की शिक्षा का प्रबंध किया जाए तो डॉक्टर गांवों में जरूर रुकेंगे।
-
कैंसर से करीबियों की मौत ने दिया मरियम को झटका
- मुरादाबाद के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पाशा लतीफ की बेटी मरियम की मां भी डॉक्टर हैं। डॉक्टर दंपती की बेटी मरियम के मुताबिक उनका सपना तो शुरू से ही डॉक्टर बनने का रहा इसलिए कठोर परिश्रम करके नीट क्वालिफाई किया। मरियम कहती हैं कि मौका मिला तो वह कैंसर रोग विशेषज्ञ बनना चाहेंगी। दरअसल उनके कई नजदीकी लोगों की कैंसर से हुई मौत ने उन्हें झकझोड़ा है। उन लोगों के पास धन भी था पर अंतिम चरण में आने पर कैंसर का पता चला तो बचाया नहीं जा सका। कहा कि शुरुआती दौर में ही इसका पता चल सके इसलिए सरकार को निगरानी तंत्र व जांच का दायरा बढ़ाना चाहिए।
-
बस चले तो दिल की डॉक्टर बनें जूबिया
मुरादाबाद निवासी जूबिया मलिक के पिता फार्मेसी कारोबार से जुड़े हैं। इस नाते जूबिया को दवा व डॉक्टरी पेशे की शुरुआती समझ है। उन्होंने बताया कि कार्डियोलॉजिस्ट की देश में बड़ी कमी है। एक ओर जहां खानपान, अनियमित दिनचर्या और जरूरत से ज्यादा काम का तनाव लोगों को दिल का रोगी बना रहा है वहीं हृदय रोग विशेषज्ञों की कमी लोगों की समस्या को बढ़ा रही है। कहा कि प्रयास करेंगी कि पीजी में कार्डियोलॉजी स्ट्रीम मिल जाए। वह हृदय रोग विशेषज्ञ बनीं तो गरीब तबके से जुड़े मरीजों की समस्या दूर करने पर जोर देंगी।
-
विदुषी बोलीं- सुरक्षित प्रसव देहात में बड़ी समस्या
अलीगढ़ निवासी विदुषी गुप्ता के मुताबिक पिता प्राइवेट जॉब में और मां टीचर हैं। उनका सपना डॉक्टर बनने का था तो परिवार ने पढ़ाने और तैयारी कराने में कसर नहीं छोड़ी। बताया कि कुशल स्त्री रोग विशेषज्ञ बनना उनका सपना है। देहात क्षेत्र में संस्थागत प्रसव न होने से अक्सर महिलाओं व बच्चों की मौत हो जाती है। गरीब परिवारों की महिलाओं को खून की कमी से लेकर गर्भावस्था की दूसरी दिक्कतों के बारे में जानकारी नहीं होती जो आगे चलकर मुसीबत खड़ी करती है। बच्चों व माताओं का कुपोषण भी इसी से जुड़ा है। वह इसी दिशा में काम करके हालात सुधारने का काम करेंगी।
-
प्राचार्य बोले- ज्यादा काबिल होंगे नई पीढ़ी के डॉक्टर
राजकीय मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे छात्र छात्राएं काफी होशियार हैं। वह परंपरागत पढ़ाई के साथ नए विषयों व जानकारियों को भी आत्मसात कर रहे हैं। ओपीडी व भर्ती मरीजों की चिकित्सा में लगे वरिष्ठ चिकित्सकों से भी वह काफी चीजें सीखते और सवाल पूछकर जिज्ञासा का समाधान करते हैं। लग रहा है कि जब वह पूरी तरह डॉक्टर बनकर फील्ड में आएंगे तो बेहतर काम करेंगे और जनता के लिए ज्यादा उपयोगी साबित होंगे।
- डॉ. धर्मेंद्र गुप्ता, प्राचार्य राजकीय मेडिकल कॉलेज