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आधी आबादी ने पाया सम्मान...घर परिवार तक सीमित न रहकर हर क्षेत्र में हासिल किया मुकाम

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बदायूं। महिलाएं समाज का अहम हिस्सा हैं। समाज और परिवार के लिए तो अहम भूमिका निभा रहीं हैं, साथ ही चहारदीवारी से बाहर निकलकर भी हर क्षेत्र में मुकाम हासिल कर रहीं हैं । महिलाओं की हर क्षेत्र में भागीदारी बढ़ रही है। बावजूद इसके अब भी काफी संख्या में महिलाएं ऐसी हैं जिनको अपने अधिकारों के बारे में नहीं मालूम, जागरूकता की कमी से वह अब भी चहारदीवारी में कैद हैं। हर वर्ष आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इसी क्रम में पहचान बनाने वाली कुछ महिलाओं की कहानी हम यहां बता रहे हैं जो दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन गईं।
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पति के निधन के बाद उर्मिला ने संभाला परिवार
आवास विकास निवासी उर्मिला शर्मा के पति राममोहन शर्मा का 1998 में निधन हो गया था। उर्मिला शर्मा के तीन बेटियां थीं। पति के निधन के बाद उर्मिला ने न सिर्फ परिवार को संभाला, बल्कि तीन बेटियों की शादी भी की। करीब 24 साल पहले उर्मिला ने इंदिरा चौक रायजादा अस्पताल के सामने टाइपिंग इंस्टीट्यूट शुरू किया था। वक्त बदलने के साथ अब वह कंप्यूटर इंटीट्यूट चला रही हैं। उर्मिला ने अपने दम पर तीन में से एक बेटी की शादी मुंबई, एक की दिल्ली और एक की बिजनौर में अच्छे परिवारों में की है। बिजनौर में ब्याही सबसे छोटी बेटी इन दिनों यहां मां के पास ही रहकर काम में उनका हाथ बंटाती हैं। उर्मिला शर्मा का कहना है कि महिलाएं किसी से कमजोर नहीं हैं।
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किरन ने ब्यूटी पार्लर से दिया परिवार को सहारा
शहर की श्रीरामनगर कॉलोनी निवासी किरन मलिक 30 साल से ब्यूटी पार्लर चला रहीं हैं। शादी के बाद से ही उन्होंने पति का हाथ बंटारा शुरू कर दिया था। किरन ने खुद को चहारदीवारी में कैद नहीं रखा। दो बेटियां और एक बेटे की शादी कर चुकीं हैं। पति और उनके बेटे रेडीमेड गारमेंट की दुकान चलाते हैं। किरन का कहना है कि महिलाएं अगर घर-परिवार संभालने के साथ सशक्त बनने के लिए कुछ अलग से करती हैं तो बुरा क्या है। हर क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ रहीं हैं, लेकिन गांव-देहात में अब भी महिलाएं सशक्त नहीं हो सकी हैं। इसका एक कारण जागरूकता का अभाव है। महिलाएं अपनी जिम्मेदारी के साथ खुद के अधिकारों को भी समझें तो बदलाव निश्चित होगा।
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बुटीक का कारोबार शुरू कर रमा ने परिवार को सशक्त बनाया
सैय्यदबाड़ा निवासी रमा गुप्ता ने बुटीक के कारोबार के जरिये परिवार को सशक्त बनाने का काम किया। रमा के पति अर्जुन गुप्ता कपड़े की दुकान चलाते थे। उनका काम ठप हो गया तो करीब 22 साल पहले रमा ने बुटीक का काम शुरू किया। बुटीक के काम के जरिये ही उन्होंने बेटे अंकुश गुप्ता को उच्च शिक्षा दिलाई। अंकुश अब भारतीय वायु सेना में हैं। रमा गुप्ता की बेटी सरकारी शिक्षिका हैं। वह दिल्ली में ब्याही हैं। रमा गुप्ता ने बताया कि जब पति का कारोबार ठप हुआ था तब परिवार काफी समस्या में था, लेकिन अब परिवार सशक्त है। बुटीक के काम करने के साथ वह पोस्ट ऑफिस और बीमा संबंधी काम भी करती हैं। अब पति अर्जुन गुप्ता उनका हाथ बंटाते हैं।
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20 साल पहले शुरू किया था फैंसी मछलियों का व्यापार
शहर में आर्य समाज के पास रहने वाली कमलेश ने 20 साल पहले फैंसी मछलियों का व्यापार शुरू किया। उस समय तक शहर में इस तरह का काम गिने-चुने लोग ही करते थे। 20 साल पहले तक शहर में ऐसे लोगों की संख्या काफी कम थी जो मछलियां पालने का शौक रखते थे। कमलेश का कहना है कि अब उनका व्यापार काफी अच्छा चल रहा है। पति के निधन के बाद कमलेश ने दो बेटियों की शादी भी की। अब वह अकेली रहती हैं। उनका ज्यादातर समय दुकान पर कटता है। कमलेश का कहना है कि अगर महिलाएं खुद को कमजोर न समझें तो वह कुछ भी कर सकती हैं।
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प्रसव और बच्ची की मौत के बाद भी परीक्षा देने पहुंचीं लूसी
फर्रुखाबाद के कायमगंज निवासी लूसी गंगवार दबतोरी के कुमारी मंजू लता मैमोरियल इंटर कॉलेज में शिक्षिका हैं। लूसी के पिता सेना में थे। उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की तभी परिवारवालों ने उनकी शादी कर दी। लूसी ने शादी के बाद भी शिक्षा को तवज्जो दी। लूसी ने बताया कि 1984 में उनकी शादी हुई। वह स्नातक कर रहीं थीं। परीक्षा के दिनों में उन्होंने बेटी को जन्म दिया। बाद में उसकी अस्पताल में ही मौत हो गई, बावजूद इसके अगले ही दिन वह परीक्षा देने चली गईं। लूसी ने बताया कि उनकी मां नहीं चाहती थीं कि वह आगे की पढ़ाई करें। लूसी का कहना था कि वह परीक्षा देने नहीं जातीं तो उनकी शिक्षा एक साल पीछे हो जाती।
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बहन और भाई के साथ पिता की जिम्मेदारी भी संभाल रहीं सिमरन
शहर के मोहल्ला सैय्यदबाड़ा निवासी सिमरन बतरा नौ साल से परिवार को संभाल रही हैं। जिम्मेदारियों को उन्होंने स्वीकार किया। मां का निधन होने और पिता किशनलाल बतरा की आंखें कमजोर होने के बाद परिवार में सबसे बड़ी सिमरन ने चुनौती को चुनौती देने की कोशिश की। अब वह खुद को कामयाब मानती हैं। सिमरन छोटी बहन गौरी बतरा और भाई समीर बतरा की पढ़ाई का खर्च उठा रही हैं। एक कान्वेंट स्कूल में शिक्षिका के रूप में सेवाएं देने के साथ ही सिमरन ट्यूशन भी देती हैं। सिमरन का कहना है कि हिम्मत से काम लिया जाए तो रास्ते खुद बन जाते हैं।
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अनोखी पहल : महिला स्वयं सहायता समूह ने लगाई गोबर से पेंट बनाने की फैक्टरी
बदायूं। बिनावर के गांव रफियाबाद में महिलाओं के शिव-पार्वती महिला स्वयं सहायता समूह ने गाय के गोबर से पेंट और डिस्टेंपर बनाने की फैक्टरी लगाई है।
गांव घटपुरी निवासी रूबी सिंह, सविता, ज्योति सिंह ने स्वयं सहायता समूह को विभिन्न योजनाओं से मिलने वाले लाभ के तहत 20 लाख का ऋण प्राप्त किया। इसके बाद इस समूह ने एनआरएलएम कंपनी से करार किया। उपकरण आदि की खरीद भी इसी कंपनी से की। अब यहां गोबर से पेंट और डिस्टेंपर बनाने का काम चालू हो गया है।
रूबी सिंह, सविता सिंह, ज्योति सिंह ने बताया कि गाय के गोबर को पहले उबाला जाता है। इसके बाद इसे मशीन में डालकर फिल्टर किया जाता है। फिल्टर के साथ कुछ कैमिकल्स इसमें मिलाए जाते हैं। यह प्राकृतिक पेंट और डिस्टेंपर होता है। फैक्टरी में आठ लोगों का स्टाफ है। सुबह दस से शाम छह बजे तक यहां काम होता है। जिला प्रशासन की ओर से फैक्टरी के लिए भवन उपलब्ध कराया गया है। दस मार्च के बाद शुभारंभ होगा और फिर फैक्टरी का काम विधिवत शुरू से चालू हो जाएगा। संवाद
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