बदायूं। हिंदी में कई पुस्तकें और काव्य संग्रह ‘घुटन’ लिखने वालीं वयोवृद्ध कवयित्री और एनएमएसएन दास पीजी कॉलेज के हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त डॉ. कमला माहेश्वरी हिंदी को विविधता में एकता की भाषा बताती हैं।
हिंदी हैं हम अभियान के तहत उनसे बातचीत की गई तो उन्होंने हिंदी को प्रेम की भाषा बताया। कहा कि हिंदी की ‘तू तड़ाक’ में भी अपनापन सा झलकता है जबकि अंग्रेजी औपचारिकता को बढ़ावा देने वाली जुबान है।
डॉ. कमला माहेश्वरी ने बताया कि दूसरी भाषाओं के मुकाबले हिंदी विविधतापूर्ण भाषा है जो सहायक भाषाओं के साथ देश को एकता के सूत्र में बांधने का काम करती है। कहावत है कि ‘कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’। बदायूं जिले के ही अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह की हिंदी बोली जाती है। जिले के अधिकतर हिस्सों में खड़ी बोली का चलन है।
यहां पूर्वी सीमा से लगने वाले दातागंज क्षेत्र की भाषा में कन्नौजी पुट है तो कछला में ब्रज भाषा मिश्रित हिंदी बोली जाती है।
कहा कि हिंदी सही मायने में अवधी, कन्नौजी, बुंदेली, खड़ी, ब्रज, बांगरू की महतारी (मां) है। वहीं पंजाबी, बंगाली, उड़िया, मुड़िया, मैथिली, बिहारी आदि इसकी भाषानुजाएं हैं जो अनेकता में एकता का रोपण कर प्रेम की जंजीर बनाती हैं। स्वाधीनता संग्राम में हिंदी में ही हमारे कवियों ने गीतों को स्वर लहरी दी। इन्हें गाकर राष्ट्र चेतना और वीरों में ऊर्जा का संचार किया गया और राष्ट्र को अंग्रेजों से मुक्त कराया गया। डॉ. माहेश्वरी ने हिंदी को समर्पित अपनी रचना का अंश सुनाया।
‘अपनी भाषा अपना गान, अपना एक निशान, होते हैं जब पास हमारे, बनता राष्ट्र महान।’