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हिंदी को जन-जन की भाषा बनाएं

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बदायूं। देश के बड़े भू-भाग में बोली जाने वाली हिंदी को जन जन की भाषा बनाने की जरूरत है। शिक्षकों और विद्वानों का कहना है कि जरूरी है कि हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए।
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सभी देशों के लोग पहले अपनी भाषा और फिर विदेशी भाषा सीखते हैं। विचार, चेहरे के हावभाव, हाथ की अंगुलियां चलना यह सब विचार से ही उत्पन्न होते हैं। भाषा की एकता व अखंडता विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो मातृभाषा के उद्धार के लिए सख्त नियम बनाने होंगे।
- डॉ. ममता नौगरैया, वरिष्ठ साहित्यकार
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किसी भी देश को स्वतंत्र व समृद्ध राष्ट्र बनाने के लिए उसकी अपनी भाषा होना आवश्यक है। जब विदेशी लोग अपनी भाषा को प्राथमिकता दे सकते हैं तो हिंदुस्तानी हिंदी को क्यों नहीं दे सकते। काफी संघर्ष के बाद हिंदी के प्रचार प्रसार का काम आगे बढ़ा है। इसका प्रयोग और बढ़ाने की जरूरत है।
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- डॉ. सुधाकर आशावादी, असिस्टेंट प्रोफेसर, शिक्षा शास्त्र, एनएमएसएन दास पीजी कॉलेज
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शीर्ष पदों पर बैठे जिम्मेदारों से इस मामले में सीखने की जरूरत है। जब प्रधानमंत्री हिंदी में हस्ताक्षर करते हैं तो आम लोग क्यों नहीं कर सकते। सूरदास , तुलसीदास, मीराबाई सब हिंदी भाषा का प्रयोग करके ऐसी रचनाएं लिख गए जो उनके दुनियां से जाने के बरसों बाद भी लोगों के जेहन में रखे हैं। हिंदी को जन-जन की भाषा बनाना होगा।
- डॉ. कमला माहेश्वरी, रिटायर्ड प्रोफेसर, हिंदी
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हिंदी को व्यवहार में लाने और उसके अधिकाधिक प्रयोग की जरूरत है। सरकारी व गैरसरकारी विभागों के कई कामकाज अब भी अंग्रेजी में होते हैं। बड़ी अदालतों में फैसले व अन्य कामकाज की बात हो या उच्च संस्थाओं में शिक्षण की, हिंदी अब भी दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग की जाती है। इसके चलन को बढ़ाने के उपाय करने होंगे।
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- डॉ. सरला चक्रवर्ती, एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी, गिंदो देवी कॉलेज
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