बदायूं। मातृभाषा हिंदी को बोलने से लेकर लिखने तक तमाम तरह की गड़बड़ी देखने में आ रही है। ऐसी नई पीढ़ी के साथ यह समस्या ज्यादा है जो कान्वेंट स्कूलों से पढ़कर आ है। स्थिति यह है कि अपने विषय में टॉप करने वाले विद्यार्थी भी एक प्रार्थना पत्र या आवेदन शुद्धता के साथ नहीं लिख पाते। शिक्षकों का मानना है कि ऐसे में जरूरी है कि मात्राओं को लेकर सजग रहा जाए।
हिंदी व्याकरण की अशुद्धियों को सुधारने की पहल घर से ही करनी होगी। बच्चे शुरू में जब गलत उच्चारण करें तभी माता-पिता उन्हें टोकें। दूसरी जिम्मेदारी शिक्षकों की है। प्रयास करना चाहिए कि मातृभाषा में तो गलतियां न हों।
- डॉ. सुधाकर आशावादी, वरिष्ठ साहित्यकार
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विद्यार्थियों में वर्तनी की गलतियां सुधारने में शिक्षकों की प्रमुख भूमिका है। पहले यह काम वृहद स्तर पर होता था। समय के साथ टोकाटाकी कम होती जा रही है। कई मामलों में विद्यार्थी तो कई बार उनके माता पिता को शिक्षकों का टोकना गलत लगता है।
- अंशू सत्यार्थी, कार्यवाहक प्राचार्य, राजकीय डिग्री कॉलेज
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हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसमें कम ज्ञान होना और गलतियां करना सही नहीं है। विद्यार्थियों को इस बारे में प्रयास करना चाहिए कि इस विषय में सर्वाधिक अंक लाने का प्रयास करने के साथ ही शाब्दिक त्रुटियां न करें। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, उन्हें इन गलतियों का अहसास कराएं।
- डॉ. प्रेमचंद्र चौधरी, असिस्टेंट प्रोफेसर हिदी, राजकीय डिग्री कॉलेज
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हिंदी की कुछ गलतियां तो अब ऐसी मान्यता ले बैठी हैं कि हम उन्हीं शब्दों को सही मानने लगते हैं जो तकनीकी के हिसाब से गलत हैं। आपतकाल शब्द को अब आपातकाल लिखा जा रहा है जो गलत है। चौड़ीकरण शब्द सरकारी कागजों से लेकर तमाम जगह प्रयोग होता है जो सही नहीं है। हमें सीखने की जरूरत है पर हम समय अभाव या दूसरी वजहों से पुरानी लकीर पीट रहे हैं।
- डॉ. श्रीकांत मिश्र, रिटायर्ड प्रोफेसर हिंदी