बदायूं। कोरोना काल में बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए रिजर्व बैंक ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। ऐसे में फिलहाल कर्ज सस्ता होने की गुंजाइश कम ही है। सावधि जमा और बचत खातों पर भी ज्यादा ब्याज नहीं मिलेगा। हालांकि, आरबीआई ने यह कदम अर्थव्यवस्था संभालने के लिए उठाया है, लेकिन व्यापारी वर्ग इससे खुश नहीं है। व्यापारियों का कहना है कि बाजार में अगर नकदी की कमी होती तो अर्थव्यवस्था को रफ्तार नहीं मिलेगी। अगर कर्ज सस्ता होता है तो अर्थ व्यवस्था भी रफ्तार पकड़ती है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए केंद्र सरकार के 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज से भी व्यापारी वर्ग इत्तेफाक नहीं रखता है। व्यापारियों का कहना है कि उन्हें और रियायतों की उम्मीद थी, लेकिन निराशा हाथ लगी।
कम नहीं होंगी होम, कार और पर्सनल लोन पर ब्याज दरें
अगर रिजर्व बैंक रेपो रेट में कटौती करता है तो इसका ज्यादा असर दरों पर होता है। रेपो रेट कम होने पर बैंक लोन पर ब्याज दरों को कम कर देता है। आर्थिक मामलों की जानकारी रखने वाले बताते हैं कि रेपो रेट कम होने पर होम, कार या पर्सनल लोन पर ब्याज की दरें कम हो जाती है। रिजर्व बैंक ने रेपो रेट की दरों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया है। ऐसे में कर्ज पर ब्याज दरें कम नहीं होंगी। काफी संख्या में व्यापारी बैंकों से कर्ज लेकर धंधा करते हैं। क्रेडिट कार्ड कर चलन भी बढ़ता जा रहा है। एक कारण यह भी है कि जब बाजार में नकदी बढ़ जाती है तो महंगाई बढ़ने का खतरा भी बना रहता है। महंगाई पर काबू के लिए आरबीआई रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा देता है। इस बार आरबीआई ने दोनों में ही किसी तरह का बदलाव नहीं किया है। ऐसे में बैंकों के पास लोन लेने के लिए आने वालों की संख्या पर भी असर होगा। इसके साथ ही विभिन्न जमा योजनाओं पर भी बैंक ज्यादा ब्याज नहीं देंगे। जानकारों का कहना है कि इसके परिणाम दीर्घकालिक हो सकते हैं।
बैंकों में एफडी कराने वालों को मिलेगी राहत
रेपो रेट में बदलाव न होने की दशा में बैंकों में की जाने वाली फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) पर ब्याज दरें नहीं घटाई जाएंगी, जिसका लाभ एफडी कराने वालों को मिलेगा। चूंकि अधिकांश लोग आज भी बैंकों की एफडी को सुरक्षित निवेश मानते हैं क्योंकि इसमें इक्विटी की तरह अनियमितता नहीं होती और एक निश्चित धनराशि उपभोक्ता को निर्धारित समय पर मिलती है। हालांकि बैंकों में पहले की तुलना में जिस प्रकार एफडी पर ब्याज दरें घटी हैं उससे ज्यादातर लोगों का रुझान शेयर मार्केट की तरफ हो रहा है।
क्या है रेपो और रिवर्स रेपो रेट
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है और बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को ऋण देते हैं जबकि रिवर्स रेपो रेट रेपो रेट से उलट होता है। बैंकों के पास जब दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी रकम बची रह जाती है, तो उस रकम को रिजर्व बैंक में रख देते हैं। इस रकम पर आरबीआई उन्हें ब्याज देता है। रिजर्व बैंक इस रकम पर जिस दर से ब्याज देता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।
रिजर्व बैंक समय-समय पर रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट तय करता है। काफी समय से इनमें बदलाव नहीं किया गया है। इसका एक एक कारण कोरोना काल में छाई आर्थिक मंदी भी है। हाल ही में जारी नई मौद्रिक नीति में भी कोई खास बदलाव नहीं है। बैंकों के पास नकदी उपलब्धता की बात करें तो इसमें जमा योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ज्यादातर बैंकों की जमा योजनाओं पर मिलने वाला ब्याज लगभग समान है। हालांकि, कर्ज पर ब्याज दरें अलग-अलग हैं। रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट का ज्यादा असर लोन पर होता है। अगर रिवर्स रेपो रेट को बढ़ाया गया होता तो जमा योजनाओं पर ब्याज ज्यादा हो सकता था। दो दिन के अवकाश के बार सोमवार को बैंक खुलेंगे। इसके बाद ही इस बारे में ज्यादा कुछ कहा जा सकता है।
- संजय मलिक, अध्यक्ष पीएनबी इंप्लाइज एसोसिएशन