पुरातत्व और पौराणिक महत्व के कई स्थल हैं यहां
शासन और प्रशासन की उपेक्षा से खो रहे अस्तित्व
वर्ल्ड हेरिटेज डे पर विशेष
जिले में पुरातत्व महत्व के तमाम भवन और स्थल हैं। जहां पर्यटन को बढ़ा दिया जा सकता है, लेकिन पर्यटन विभाग की उपेक्षा के कारण सभी ऐतिहासिक स्थल अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। यहां तक की पौराणिक स्थलों की भी जिले में भरमार है। इन सभी के रहते बदायूं को पर्यटन स्थल के रूप में नहीं विकसित किया गया। बड़े स्तर पर किसी भी ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल को तरजीह नहीं मिली। पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल रामनगर और आगरा के मध्य पड़ने वाले बदायूं को अगर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए, तो यहां पर्यटकों की आमद बढ़ेगी और आर्थिक विकास भी होगा।
गंगा और रामगंगा के अलावा आधा दर्जन नदियों वाला ये जिला ऐतिहासिक, पौराणिक दृष्टि से समृद्ध है। इन स्थलों के अलावा प्राकृतिक सौंदर्य से भी जिला धनी है। जिले को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाए, तो यहां का आर्थिक और सामाजिक विकास तेजी से होगा। वर्ल्ड हेरिटेज डे सोमवार को है। ऐसे में जिले की इन धरोहरों का जिक्र न करना बेमानी होगा। आइए जानते हैं इतिहास में दर्ज इन इमारतों के बारे में जो उपेक्षा के अभाव में अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं।
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मुमताज महल की बहन परबर खानम का मकबरा
शहर से सटे हुए कस्बा शेखूपुर में शाहजहां की बेगम मुमताज महल की सगी बहन बेगम परबर खानम का मकबरा है। मुमताज की याद में बने ताजमहल को जहां दुनिया भर में प्यार की निशानी के तौर पर जाना जाता है, वहीं उनकी बहन का मकबरा गुमनाम है। जहांगीर को बचपन में शेखूबाबा के नाम से पुकारा जाता था, उनके नाम पर ही शेखूपुर का नाम पड़ा। बेगम परबर खानम के मकबरे को यूं तो ऐतिहासिक इमारत घोषित कर पुरातत्व विभाग ने अधिग्रहीत कर लिया है, लेकिन यह मकबरा अब भी उपेक्षित है।
बदायूं में भी एक ताजमहल
बदायूं में मोहल्ला जवाहरपुरी स्थित नवाब इखलास खां का रोजा ताजमहल की प्रतिकृति है। ककईया ईंटों और सुर्खी चूना से 17वीं शताब्दी में बनी इस इमारत को पुरातत्व विभाग ने अधिग्रहीत कर लिया है। ऐतिहासिक महत्व की इस इमारत के आसपास नियमानुसार दो सौ मीटर परिधि में कोई भी निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन नगर परिषद प्रशासन ने रोजा से महज चार-पांच मीटर की दूरी पर नए बने आवासों के भी नक्शे पास कर दिए हैं। इमारत की सुरक्षा का भी कोई इंतजाम नहीं है। पहले यहां पुरातत्व विभाग का चौकीदार रहता था, लेकिन काफी समय से चौकीदार भी नहीं है। पूरे दिन बच्चे परिसर में धमा-चौकड़ी करते रहते हैं। दीवारों को खुरच कर अपने नाम लिखते रहते हैं। इससे इमारत की खूबसूरती खत्म हो रही है।
परशुराम की पौराणिक कहानी से जुड़ा है सहसवान
पौराणिक प्रसंगों में वर्णित राज सहस्त्रबाहु सहसवान में राजधानी बनाकर राज्य करते थे। यहां उनके किले के अवशेष हैं। राजा सहस्त्रबाहु द्वारा परशुराम के पिता जगदग्नि की प्रिय गाय कामधेनु को हर लिया था। बाद में क्रोधित परशुराम ने सहस्त्रबाहु को मारकर उसका किला भी तहसनहस कर दिया। बाद में उन्होंने फरसे के प्रहार से सप्तस्रोत (सरसोता) बहाकर अपनी प्यास बुझाई। सहसवान में ही सप्तस्रोत आज भी मौजूद है। पास की महावा नदी और झील है। हालांकि दोनों ही जलस्रोत यहां सूख चुके हैं।
कल की उष्णापुरी आज का उसावां
जिले में महाभारत काल के लाक्षागृह का जिक्र आता है, तो उसावां का जिक्र भी शामिल हो जाता है। बताते हैं कि यहीं पांडवों को मारने के लिए लाक्षागृह बनवाया गया था। सौभाग्य से पांडव बच निकले थे। दैत्यों के गुरुशुक्राचार्य का आश्रम भी बदायूं में बताया जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार उसावां का कटरी क्षेत्र दैत्य गुरु का आश्रम हुआ करता था।
संरक्षित मखदून जहां का मकबरा
शहर में शेखूपुर रोड पर प्राचीन मकबरों की श्रृंखला में मखदून जहां का मकबरा है। यह आलम शाह अलाउद्दीन की मां थीं। पर्यटक विभाग द्वारा इस मकबरे को संरक्षित तो कर लिया गया, लेकिन मौके पर कुछ लोंगों ने मकबरे का प्रतिबंधित क्षेत्र कब्जाकर बारात घर भी बनवा लिया है। यह मकबरा भी अपना अस्तित्व खोता जा रहा है।
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यह सही है कि बदायूं पर्यटन के लिए अपार संभावनाएं संजोए हुए हैं। जब-तब इसके लिए शासन को प्रस्ताव भी जाते रहते हैं। जिले के पौराणिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्वरूप को विकसित कर इनसे पर्यटकों को लुभाया जा सकता है। अबतक कुछ स्थानों के लिए पर्यटन स्थल के रूप में विकसित भी किया जा रहा है। आगे संभावनाओं पर विचार किया जाएगा।
- कीर्ति, डीडी पर्यटन