1971 के युद्ध के जवानों ने सुनाई शौर्य की कहानी
बिजनौर। 1971 में हुए युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इसी के साथ पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में एक नया देश बन गया था। 1971 में हुए उस युद्ध में जनपद के भी कई सैनिकों ने भाग लिया था और दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। आइए 1971 की जंग में शामिल होने बाले जवानों की जुबानी ही जानते हैं शौर्य की कहानी। संवाद
ढाका केवल सात किलोमीटर दूर था : दयाराम सिंह
गांव नगला निवासी दयाराम सिंह ने उस युद्ध में भाग लिया था। दयाराम सिंह बताते हैं कि उस समय उनकी पोस्टिंग असम में थी। इसके बाद उनकी रेजीमेंट को त्रिपुरा राज्य में धनपुर में भेजा गया था। वहां से भारतीय सेना ने लाल बाग में हमला किया था और निया बाजारी, लक्सम, दाऊद कंडी, चांदपुर, बंदर स्टेशन से होते हुए सेना नारायणगंज तक पहुंच गई थी। नारायणगंज ढाका से मात्र सात किलोमीटर दूर है। दयाराम सिंह बताते हैं कि उनके कमांडिंग ऑफिसर एल एम सब्बरवाल थे। उस युद्ध में बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी भी भारतीय सेना का सहयोग कर रही थी। युद्ध के बाद उन्हें सेना का मेडल भी प्राप्त हुआ था।
ट्रेनिंग के तुरंत बाद लड़ी थी लड़ाई : आनंद स्वरूप
गांव जलालपुर निवासी आनंद स्वरूप ने भी 1971 का युद्ध लड़ा था। वह 1971 में ही सेना में भर्ती हुए थे और ट्रेनिंग के तुरंत बाद वह लड़ाई के लिए चले गए थे। उनकी पोस्टिंग पंजाब के फिरोजपुर जनपद के फाजिल्का कस्बे में थी। लड़ाई शुरू होने के बाद उनकी रेजीमेंट ने गुरुमुखी खेड़ा गांव में दुश्मनों से दो हाथ किए। वह बताते हैं कि पाकिस्तान ने उनकी टुकड़ी पर हवाई हमला किया था। उनकी रेजीमेंट का नेतृत्व कर्नल आरके सूरी कर रहे थे। उनके साथ थर्ड असम, 15 राजपूत और चार जाट रेजीमेंट भी लड़ रही थी। उस युद्ध में उनके कई साथियों को वीरगति प्राप्त हुई थी, लेकिन भारतीय सेना की आग उगलती एलएमजी के आगे पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे।
छुट्टी निरस्त हो गई, संभाल लिया था मोर्चा : सविंदर सिंह
ब्लॉक जलीलपुर के ग्राम बड़िया नंगली निवासी सविंदर सिंह उस युद्ध के दौरान पटियाला में तैनात थे। ट्रेनिंग के तुरंत बाद वह दो माह की छुट्टी पर थे, लेकिन उनकी छुट्टियां निरस्त कर दी गईं और सांबा के पास रैया गांव में उन्होंने मोर्चा संभाला। वहां पाकिस्तान की सेना द्वारा बारूदी सुरंग लगाई गई थी तथा टैंक खड़े थे। भारतीय सेना ने जांबाजी से पाकिस्तानी सेना का मुकाबला किया और उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया। वह जीत आज भी रोमांचित करती है।
जीत का जमकर मनाया था जश्न : महेंद्र सिंह
हल्दौर थाना क्षेत्र के खैराबाद निवासी महेंद्र सिंह लड़ाई के दौरान बरेली मिलिट्री हॉस्पिटल में तैनात थे। उनका नाम भी उन वालंटियर में आया था, जिन्हें युद्ध पर लड़ने के लिए जाना था। बरेली से वह ढाका के निकट खुलना सेक्टर पर गए। उसी दौरान जनरल नियाजी के आत्म समर्पण का समाचार मिला। महेंद्र सिंह बताते हैं कि उस जीत पर जमकर जश्न मनाया था। पाकिस्तान की बलूच रेजीमेंट पर पेट्रोलिंग के दौरान एक भारतीय सैनिक ने ग्रेनेड फेंक दिया था जिसमें दर्जनों पाकिस्तानी सैनिक घायल हो गए थे। जिनका उपचार बरेली में हुआ था। पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सेना को सबसे शक्तिशाली सेना बताते थे।