नजीबाबाद। हाथ मुस्लिम कारीगर के, आस्था हिंदू पर्व की और संदेश असत्य पर सत्य की विजय का। कुछ ऐसी ही गंगा-जमुनी तहजीब और सांप्रदायिक सौहार्द की जीवंत मिसाल पेश कर रहे हैं नजीबाबाद के हबीबुर्रहमान। पिछले 40 वर्षों से वह दशहरा पर्व पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले अपने हाथों से बना रहे हैं। इस पुनीत कार्य में उनका पूरा परिवार कंधे-से-कंधा मिलाकर सहयोग करता है।
मोहल्ला मुगलूशाह निवासी हबीबुर्रहमान बताते हैं कि रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले तैयार करने में एक से डेढ़ माह का समय लगता है। बांस की मजबूत लकड़ी पर कागज, कपड़े और आकर्षक रंगों से पुतलों को सजाया जाता है। रावण के पुतले की ऊंचाई 35 फीट, कुंभकरण की 30 फीट और मेघनाद की 25 फीट रखी जाती है, ताकि दूर से ही वह भव्य और आकर्षक दिखें। एक पुतला 30 हजार से 35 हजार रुपये में बिकता है। महंगाई बढ़ने के कारण अब इस काम में पहले जैसा औसत नहीं रह गया है, फिर भी शौक और परंपरा के चलते वे लगातार यह कार्य कर रहे हैं।
हरिद्वार, कोटद्वार की भी शोभा बढ़ाते हैं पुतले
हबीबुर्रहमान के बनाए गए रावण, कुंभकरण, मेघनाद पुतले नजीबाबाद ही नहीं, बल्कि कोटद्वार, हरिद्वार, दुगड्डा व अन्य शहर के दशहरा मेलों की शोभा बढ़ाते हैं। खास बात यह है कि हबीबुर्रहमान स्वयं रामलीला मैदान में जाकर पुतले स्थापित करते हैं और दहन तक मौजूद रहते हैं। उनका कहना है कि त्योहार किसी धर्म के नहीं, सभी के होते हैं।
बुजुर्गों से मिली पुतले बनाने की विरासत
हबीबुर्रहमान, शहजाद, उम्रदराज बताते हैं कि पुतले बनाने की कला उन्होंने अपने बुजुर्गों से सीखी है। बुजुर्गों की दी गई विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं जबकि अब इस काम में पहले की अपेक्षा मुनाफा नहीं रहा। लेकिन जो मिलता है उससे परिवार का भरण-पोषण करते हैं।