भ्रष्टाचार और कुरीतियों पर प्रहार थे रविंद्रनाथ त्यागी के व्यंग्य
बिजनौर। साहित्यिक क्षेत्र में बिजनौर जनपद समृद्ध रहा है। महान गजल सम्राट दुष्यंत कुमार के नाम से भी जिले की चर्चा होती है, वहीं रविंद्र नाथ त्यागी के भ्रष्टाचार और कुरीतियों पर वार करते व्यंग्य को जिले के लोग आज भी याद करते हैं।
हिंदी व्यंग्य के स्तंभ कहे जाने वाले व्यंग्यकार रविंद्र नाथ त्यागी एक उच्च कोटि के कवि भी थे। रविंद्रनाथ त्यागी ने हिंदी की व्यंग्य विधा को अपनी लेखनी से बेहद समृद्ध किया। रविंद्र नाथ त्यागी का जन्म जनपद के नहटौर कस्बे में हुआ। बचपन में बेहद अभावग्रस्त रहे। उन्होंने कम उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया। व्यंग्य विद्या में हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल और शरद जोशी के बाद रविंद्रनाथ त्यागी को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उनके व्यंग्य हास्य के साथ-साथ सीधे हृदय पर लगते थे। उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और तमाम कुरीतियों पर जमकर प्रहार किए। उनकी प्रमुख रचनाओं में बसंत से पतझड़ तक, भाद्रपद की सांझ, एक फाइल का सफर, पूरब खिले पलाश, कबूतर, कौए और तोते प्रमुख है।
जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार भोला नाथ त्यागी बताते हैं कि दूसरों पर व्यंग्य लिखना आसान है, लेकिन स्वयं पर लिखना कठिन। रविंद्र नाथ त्यागी जीवन भर खुद पर व्यंग्य लिखते रहे। यही उनकी लेखनी की खूबी रही। भोलानाथ त्यागी के बेहद करीबी रहे रविंद्र नाथ त्यागी उच्च कोटि के कवि भी थे। सूखे और हरे पत्ते, कल्पवृक्ष, आदिम राग आखिरकार, सलीब से नाव तक, अंतिम बसंत, कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा, पीले पाल वाली बूढ़ी नाव इत्यादि उनकी प्रमुख रचनाएं हैं। उनके समकालीन समस्त साहित्यकारों ने उनकी कलम का लोहा माना। हरिवंश राय बच्चन, हरिशंकर परसाई ने भी उनकी रचनाओं की जमकर प्रशंसा की। उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए जिनमें सरस्वती सम्मान, चकल्लस पुरस्कार, टेपा पुरस्कार, व्यंग्य श्री पुरस्कार, शरद जोशी पुरस्कार, हरिशंकर परसाई पुरस्कार प्रमुख हैं। 4 सितंबर 2004 को उनका निधन हो गया।